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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 495

२ आल्हाखण्ड। ४६४
विद्या पूरण सहदेऊ की कीरति रही जगतमें छाय ३
बड़ा प्रतापी रण मण्डल मा नकुलो समरधनी तलवार ॥
करण न होतो जो दुनिया मा तौ को होत दान वरियार ४
छूटि सुमिरनी गै देवन कै शाका सुनो पिथौरा क्यार ॥
नदी बेतवाके डाँड़ेपर लाखनि करी खूब तलवार ५
अथ कथाप्रसंग ॥
आल्हा ठाकुर के तम्बू मा भारी लाग राज दरवार ॥
त्यही समैया त्यहि औसर मा बोले उदयसिंह सरदार १
घाट बयालस पिरथी रोंके दादा करो कछू तदबीर ॥
इतना सुनिकै आल्हा बोले ऊदन धरो हृदय में धीर २
इतना कहिकै आल्हा ठाकुर तुरतै पान दीन धरवाय ॥
है कोउ योधा दूनों दल मा जो बितवा पर पान चवाय ३
इतना सुनिकै दोऊ दल के क्षत्री गये सनाकाखाय ॥
बोलि न आवा क्यहु क्षत्री ते सबहिन मूड़ लीन अउँधाय ४
ऊदन तड़पे त्यहि समया मा पहुँचे पाननिकट फिरिजाय ॥
आल्हा बोले तब ऊदन ते मानो कही लघुरवाभाय ५
अबती बारी है लाखनि कै गाँजर फते कीन तुम जाय ॥
नदी बेतवा के मोर्चा पर जावैं अवशि कनौजीराय ६
मीराताल्हन धनुवाँ तेली बोले दोऊ शीश नवाय ॥
तजी सम्पदा सब कनउज की आये लड़न कनौजीराय ७
नव दिन दश दिन भे गौने के सो तजिदई पदमिनी नारि ॥
बीरा खैये लाखनि राना करिये नदी भयानक रारि ८
बात बराबरी की सहिये ना चहिये जायँ नदी पर प्रान ॥
बातैं सुनिकै ये सय्यद की बीरा लीन कनौजी जवान ६