आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ आल्हाखण्ड । ४६०
कवलों अइहैं आल्हा ठाकुर नीके हवैं बनाफरराय ॥
इतना सुनिकै जगनायक जी तुरतै बोले बचन बनाय ३०७
हिंया न अइहैं आल्हा ठाकुर अब चहु करू मनावनजाय ॥
उनकै खातिर कनौजिया घर नीके दऊ बनाफरराय ३०८
पारस लैके तुम कुठरी ते पिरथी पास देउ पहुँचाय ॥
लैके कुंजी जगनायक जी कुठरीखोलिदीनवतलाय ३०६
उठे झड़ाका माहिल ठाकुर कुठरी अटे तड़ाकाधाय ॥
साँकरिमारी जगनायक जी ताला तुरत दीन डरवाय ३१०
बन्द कुठरिया माहिल ठाकुर मल्हना गई सनाकाखाय ॥
चिट्ठी दीन्ह्यो फिरिजगनायक औसबहालकह्योसमुझाय ३११
पढ़िकै चिट्ठी मल्हना रानी औ जगनायक संग लिवाय ॥
जहाँ कचहरी परिमालिक की चिट्ठी तहाँ दिखाई जाय ३१२
छन्द ॥
पढ़ि पत्रतहाँ। लहिमोद महाँ॥ परिमाल जहाँ। तजिशोकतहाँ॥
भवनमें आय । महासुख पाय ॥ लखिकैदतहाँ । उरई को जहाँ ॥
महरानि गई । तजि बन्धु दई ॥ अतिबेगचला । उरईको लला ॥
पृथिराजजहाँ। स्वउ आयतहाँ॥ सबहालकहा। बिपदाजोलहा३१३
सुनिकै बातें सब माहिल की यहु महराज पिथौराराय ॥
घाट बयालसि तेरहघाटी सबियाँतुरंतदीन रुकवाय ३१४
पहरा घूमें कहुँ पैदल का कहुँ कहुँ फिरैं घोड़असवार ॥
अनँद बधैया मोहबे बाजै घर घर होयं मंगलाचार ३१५
फाटक बन्दी है मोहवे मा घरका अवै न बाहर जाय ॥
आल्हा ऊदन की कीरति तहँ घर घर रहे नारि नर गाय ३१६
आल्ह मनौआ पूरण करिकै ध्यावों रामचन्द्र महराज ॥