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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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आल्हाकामनावन । ४८६ २७
बातैं सुनिकै लखराना की देवा कहा तुरत शिरनाय ॥
साँचे धर्मन के राँचे हैं याँचे मिले कनौजीराय २६५
कर्म कुलीनन के कीन्हे हैं साँचे मित्र बनाफरराय ॥
बातैं सुनिकै ये देवा की बोले तुरत उदयसिंहराय २६६
स्याबसि स्याबसि लाखनिराना कीन्ह्यो धर्म युद्धसों रार ॥
काहे न होवै यश क्षत्रिन को ऐसे युद्ध बीर बरियार २६७
इतना कहिकै उदयसिंह ने तुरतै कूच दीन करवाय ॥
नदी बेतवा के ऊपर मा छोरी कमर बनाफरराय २६८
डेरा गड़िगे तहँ क्षत्रिन के तम्बू गड़ा बनाफर क्यार ॥
जहँ महराजा लाखनि बैठे भारी लाग तहाँ दरबार २६६
आल्हा ठाकुर के तम्बू मा भैने गयो चँदेले क्यार ॥
कलम दवाइति कागज लैके आल्हा पत्र कीन तैयार ३००
चिट्ठी दीन्ही आल्हा ठाकुर बोले उदयसिंह सरदार ॥
खबरि जनावो तुम मल्हनाको आये कनउज राजकुमार ३०१
हमरी दादाकी दिशि हैंकै रानिन कीन्ह्यो दण्ड प्रणाम ॥
काह हकीकति है पिरथी कै सुखसोंकरो महल बिश्राम ३०२
जितनी बिल्ली हैं दिल्ली की किल्ली पकरि नचावों माय ॥
तौ तौ साँचे हम ऊदन हैं यहतुमकह्योसँदेशाजाय ३०३
सुनि संदेशा बघऊदन का हरनागरै लीन कसवाय ॥
चढ़ा तड़ाका हरनागर पर जगनिकयथातथ्यशिरनाय ३०४
नदी बेतवाको उतरत भा पहुँचत भयो मोहोबेद्वार ॥
फाटक खोल्यो दरवानी ने पहुँचे राजभवन सरदार ३०५
रानी मल्हना के महलन मा माहिल आयगयो त्यहिबार ॥
तबलौं पहुँचे जगनायक जी बोला उरई का सरदार ३०६