आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआल्हाकामनावन । ४६१ २६
जलथलजनमों जहँ दुनियामा होवों तहाँ भक्त शिरताज ३१७
पिता मातु के मैं चरणन का ध्यावों बार बार शिरनाय ॥
जिन बल गाथा यह पूरण भै भुजबलनहीं भरोसाभाय ३१८
खेत छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥
तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय ३१६
आशिर्बाद देउँ मुन्शीसुत जीवो प्रागनरायण भाय ॥
हुकुम तुम्हारो जो पावत ना ललितेकहतगाथकसगाय ३२०
रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥
मालिक ललिते के तबलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर ३२१
सुमिरि भवानी शिवशङ्कर को ह्वाँते करों तरँग को अन्त ॥
राम रमा मिलि दर्शन देवो इच्छा यही मोरि भगवन्त ३२२
इति श्रीलखनऊनवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू
प्रयागनारायणजीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलां
निवासिमिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनुपण्डितललिताप्रसाद
कृत आल्हामनावनवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥ १ ॥
ठाकुरआल्हासिंहजीकामनावन सम्पूर्ण ॥
इति ॥