आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें= आल्हाखण्ड । १४
तिनसों बोल्यो परिमालिक फिरि हमरी बात सुनो दोउ भाय ॥
दूध पूत औ धनदौलत के मालिक तुम्हीं बनाफरराय ६९
मीराताल्हन वनरस वाले तिनसों बोल्यो रजापरिमाल ॥
फौजनकेरे तुम मालिक हौ हमरे बचन करौ प्रतिपाल ७०
नाई बारी को बुलवायो तिनसों कह्यो बचन समुझाय ॥
जाति बिरादर जहाँ हमरे हैं तिनका खबरि सुनायो जाय ७१
लरिका द्वारे परिमालिक घर ब्याहन योग भये हैं आय ॥
क्वारी कन्या जिनघर होवैं टीका तुरत देयँ पठवाय ७२
सुनिकै बातें परिमालिक की नाइन पतालगायो जाय ॥
दलपतिराजा ग्वालीयर का त्यहिफिरि टीका दीनपठाय ७३
देशराज औ बच्छराज को लैके पहुँचिगयो परिमाल ॥
द्यावलि विरमाँ दूनो कन्या इनको ब्याहिदीन नरपाल ७४
देशराज का द्यावलि सँगमें विरमाँ बच्छराज के साथ ॥
ब्याहिकै चलिभे परिमालिक फिरि मनमें सुमिरि भवानीनाथ ७५
दोनों बहुवन को सँग में लै मोहवे आयगये परिमाल ॥
खबरि जनायो यह सखियनने मल्हनावहुत भई खुशियाल ७६
दौरति आई फिरि द्वारे पर औ आरती उतारी आय ॥
बाँह पकरिलइ दोउ बहुवन की राखी रंगमहल में जाय ७७
हार नौलखा के लेबे को आयो रहै करिंगाराय ॥
स्वई हार लै रानी मल्हना औद्यावलिको दीन पहिराय ७८
दूसर हार और तैसे लै विरमागले दीन फिर डार ॥
अनँद बधैया बाजन लागी घर घर होयं मंगलाचार ७९
को गनि बरणै त्यहिसमया कै हमरे बूत कही ना जाय ॥
सुखमाँ सोयो परिमालिक फिरि मल्हना संग महल हर्षाय ८०