आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआल्हाकामनावन । ४८१ १०
गारी देवो नहिं ऊदन का प्यारी मित्र हमारो जान ॥
करैं बियारी नहिं महलन में प्यारी सत्य प्रतिज्ञा मान १६६
सुनिकै बातैं लखराना की पदमा ठीक लीन ठहराय ॥
प्रीतम हमरे अब मनिहैं ना जैहैंअवशि मोहोबा धाय २००
यहै सोचिकै मन अपने मा रानी बोली फेरि सुनाय ॥
डोला हमरा सँगमा लैके राजन कूच देव करवाय २०१
मोरि लालसा यह इवालतिहै बालम मोहबा देउ दिखाय ॥
बनोवास को रघुनन्दन गे सीता लैगे साथ लिवाय २०२
सुर औ असुरन के संगर मा दशरथ साथ केकई माय ॥
लै सतिभामा कृष्णचन्द्र सँग भौमासुरै पछारा जाय २०३
जिन मर्याद्दा यह बाँधी है तेई नारि संग मा लीन ॥
बड़े प्रतापी कृष्णचन्द्र जी सोऊ पन्थ सत्य यह कीन २०४
आगे चलिगे जो क्षत्री हैं तिनमग चलनवही महराज ॥
संग में लैके बालम चालिये करिये सत्य धर्मको काज २०५
इतना कहिकै रानी पदमा आँखिनभरे आँसु अधिकाय ॥
तब लखराना लै रुमाल को आँसूपोंछि कहा समुझाय २०६
धीरज राखो चार मास लौं पँचये मिलब तुम्हें हम आय ॥
सत्य सनेहू ज्यहि ज्यहिपर है सोत्यहिमिलैतड़ाकाधाय २०७
यामें संशय कछु नाहीं है ब्राह्मण रोज कहैं यह गाय ॥
शास्त्र पुरातन की बानी यह रानी तुम्हें दीन बतलाय २०८
धर्म पतिव्रत ज्यहि नारी के प्यारी प्रीतम के अधिकाय ॥
कहा न टारै सो प्रीतम का चहु जस परै आपदा आय २०६
जो विलगावौ अब महलन मा तौ सब कीरति जाय नशाय॥
हँसै बनाफर म्वाहं मारग मा मेहरा बड़े कनौजीराय २१०
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