आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ आल्हखण्ड । ४८०
इतना कहिकै लाखनि चलिभे रानी पकरिलीन बैठाय ॥
करी बदरिया तुमका ध्यावैं कउँधाबीरनकीबलिजायँ १८७
झिमिकिकैवरसोम्वरेमहल नमा कन्ता एक रैनि रहिजायँ ॥
इतना सुनिकै लाखनि बोले रानी साँच देयँ बतलाय १८८
पाथर बरसैं आसमान ते तबहुं न रहैं कनौजीराय ॥
लौटि मोहोवे ते आवब जब रानी संग करब तब आय १८६
तेज न रहै जो देहीमा को मुहँ धरी पिथौराक्यार ॥
मुची परि है बादशाह ते लड़िहैं बड़े बड़े सरदार १६०
लौटि मोहोवे ते आवब जब रानी कहा न टारब त्वार ॥
अब हम जावत हैं जल्दी सों द्वारे उदयसिंह सरदार १६१
सुनिकै बातें ये लाखनि की रानी फेरि लीन बैठाय ॥
कैसे रहिबे हम कनउज में स्वामी देउ मोहिं बतलाय १६२
पगिया अरझी तब मोहवे मा यहु मरि जाय बनाफरराय ॥
हाय ! पियारे ज्यहि प्रीतम को ज्वानीसमयदीन अलगाय १६३
भुखी भवानी आल्है भक्षी इन्दल सहित लहुरवाभाय ॥
भरी जवानी ज्यहि प्रीतमको हमते अलगदीन करवाय १६४
काहे जनमी द्यावलि इनका ई दहिजार बड़े बरियार ॥
सुनवाँ फुलवा चित्तररेखा तीनों होउ बिना भरतार १६५
करो बियारी तुम महलन मा पलँगा उपर करो विश्राम ॥
मोरि जवानी स्वारथ करिकै तब तुम जाउ मोहोवेग्राम १६६
सुनिकै बातें ये पदमिनि की बोला फेरि कनौजीराय ॥
खड़ा बनाफर है द्वारे मा रानी काह गई बौराय १६७
अब तुम ध्यावो फूलमती का तेई फेरि मिलैहैं आय ॥
धर्म पतिव्रत का छाँड़यो ना गाही कहैं तोहिं समुझाय १६८