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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 483

आल्हखण्ड । ४८२
शोहरा फैली यहु दुनिया मा हँसिहैं जाति बिरादर भाय ॥
मेहरा लड़का रतीभान का सँगमालिहे जनानाजाय २११
तैसो समया अब नाहीं है जैसे समय भये रघुराय ॥
बड़े प्रतापी कृष्णचन्द्रजी द्वापरजन्मलीनतिनआय २१२
कलियुग बाबा की रजधानी रानी कहा गई बौराय ॥
दया धर्म दुनिया तें उठिगे दर दर सत्य पछारा जाय २१३
घर घर कुलटा हैं कलियुग में नर नर पाप भरा अधिकाय ॥
जर जर जरना है दुनिया मा हर हर हरी हरी बिसराय २१४
आखिर मरना है दुनिया मा लरना धर्म हमारा आय ॥
इतना कहिकै चला कनौजी रानी फेरि लीन बैठाय २१५
दिया बुझायो तुम परहुलका इतना किह्यो राहमें जाय ॥
पाँव पिछारी का डारयो ना चहुतनधजीधजीउड़िजाय २१६
कीरति प्यारी नर नारिन के निन्दा सुने मौत है जाय ॥
तहिले ठाकुर बघऊदन जी लाखनिलाखनिरहेबुलाय २१७
हाँक पाय कै बघऊदन कै तुरतै चला कनौजीराय ॥
द्वारे मिलिकै बघऊदन को जयचंदसभागयोफिरिधाय २१८
मस्तक धरिकै दुउ चरणनमा लाखनि ठाढ़भयो शिरनाय ॥
तब शिर सूंध्यो जयचंदराजा आयसु फेरिदीन हर्षाय २१९
आल्हा ऊदन को बुलवायो लाखनि बाँह दीन पकराय ॥
तुम्हें कनौजी का सौंपत हैं दोऊ सुनो बनाफरराय २२०
सुनिकै बातें महराजा की दोऊ भाय बनाफरराय ॥
बोलन लागे महराजा ते राजन साँचदेयँ बतलाय २२१
जहाँ पसीना लखराना का तहँ गिरि जैहैं मूड़ हमार ॥
यामें संशय कछु नाहीं है मानो सत्य भूमिभरतार २२२