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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 462

कीरतिसागरकामैदान । ४६ । ३७
भई सहायी शारद मायी स्वप्ने हाल दीन बतलाय ॥
दया कनौजी लखराना की देखा नगर मोहोबा आय २०६
चढ़ी पिथौरा जो मोहबे का दिल्ली शहर लेब लुटवाय ॥
यहिमा संशय कछु नहीं है माता साँचदीन बतलाय २०७
इतना सुनिकै मल्हना बोली लाखनिराना बचन सुनाय ॥
धन्य कोखिहै वह तिलका कै ज्यहिमारहे कनौजीराय २०८
बिछुरे ऊदन इन मिलवाये हमरी पर्ब दीन करवाय ॥
मोरि गोसैयाँ लखराना हैं जो गाढ़ेमा भये सहाय २०६
सुनिकै बातें ये मल्हना की बोले फेरि कनौजीराय ॥
पुण्य तुम्हारी ते माई सब कीन्हेकाज सिद्धियदुराय २१०
सुमिरन करिये जगदम्बा का अम्बा बैठि महल मा जाय ॥
काह हकीकति है पिरथी कै मोहबाशहर लेयँलुटवाय २११
मिला भेंट करि सब काहू सों दोऊ चलत भये सरदार ॥
छाँड़िकै बाना सब योगिनका लश्करकूचभयोत्यहिबार २१२
पार उतरिकै श्री यमुना के कुड़हरि डेरा दीन गड़ाय ॥
सातरोज को धावा करिकै कनउजगये कनौजीराय २१३
मल्हनापहुँची फिरि महलनमा राजा गये फेरि दरबार ॥
गड़े हिंडोला फिरि मोहबे मा घर घर होयँ मंगलाचार २१४
खेत छूटिगा दिननायक सों झण्डा गड़ा निशाको आय ॥
परे आलसी खटिया तकि तकि घौं घौं कण्ठ रहा घरांय २१५
माथ नवावों पितु माता को जिन बल पूर भई यह गाथ ॥
देवी देवता ये साँचे हैं इनधच पूर कीन रघुनाथ २१६
आशिर्वाद देउँ मुन्शीसुत जीवो प्रागनारायण भाय ॥
हुकुम तुम्हारो जो पावत ना कैसेकहतललितयहगाय २१७