आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ आल्हाखण्ड । ४६०
ह्वाँ सुधिपाई परिमालिक ने आये देशराज के लाल ॥
वन्दन कैकै यदुनन्दन को पलकी चढ़े रजापरिमाल १६४
कीरतिसागर मदनतालपर आये तुरत चँदेलेराय ॥
हाथ पकरिकै तहँ ऊदन का औछातीमा लीनलगाय १६५
पगिया धरदइ फिरि पैरन मा यहु रणबाघु बनाफरराय ॥
हाथ जोरिकै उदयसिंह तहँ आपनिकथा गयेसबगाय १६६
सुनिकै बातें उदयसिंह की बोले फेरि चँदेलेराय ॥
पारस पत्थर तुम लैलेवो भोगो राज्य बनाफरराय १६७
तुमका सौंपत हम ब्रह्माका ऊदन मानो कही हमार ॥
तुम जो जैहौ अब कनउज को तौ को धर्म निवाहन हार १६८
इतना सुनिकै ऊदन बोले साँची सुनो रजापरिमाल ॥
तीन तलाकें हमका दीन्ही सो अब रहीं करेजेशाख १६६
कहा मानिकै तुम माहिल का नाकछुकीन्ह्यो तनक विचार ॥
मोहिं निकारयो तुम भादों मा राजा मोहबे के सरदार २००
इतना सुनिकै मल्हना बोली साँची सुनो लहुरवाभाय ॥
जो तुम जैहौ अब कनउज का पिरथी मोहबालेय लुटाय २०१
दूध आपनो हम प्यावा है स्यावा तुम्हें बनाफरराय ॥
बैस बुढ़ापा मा दुखपावा रंजित मरे समरमा आय २०२
अबनहिं जावो तुम कनउजको मानों कही लहुरवा भाय ॥
इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिर नाय २०३
एक महीना दिन बारा भे कनउज तजे मोहिं अब माय ॥
जो नहिं जावैं अब कनउजका भाई आल्हा उठै रिसाय २०४
कीन बहाना हम गाँजर का आयन नगर मोहोबा धाय ॥
देश निकासी हमरी द्वैहै जो कहूँ सुनी बनाफरराय २०५