आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ आल्हखण्ड । ४६२
रहै समुन्दर में जौलों जल जौलों रहें चन्द औ सूर ॥
मालिक ललिते के तौलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर २१८
करों तरंग यहाँ सों पूरण तवपद सुमिरि भवानीकान्त ॥
राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छायही मोरि भगवन्त २१६
पुत्र हमारे जो चारो हैं तिनपर कृपाकरो रघुराज ॥
रामदत्त(१)औकृष्णदत्त(२)औशम्भू(३)ब्रह्मदत्त(४)महराज २२०
नन्दै चन्दे औ नन्दै वाणैंमें माधव मास विपति को काल ॥
ब्रह्मदत्त गे ब्रह्मलोक को भे अब इन्द्रदत्त युग साल २२१
सवैया ॥
संवत वनइस उनसठ आदि में माधव मास महादुखदाई ।
आय गयो विस्फोटक रोग अब शान्त भयो बहु देव मनाई ॥
फेरि अचानक भइ यह बात कि गर्दन फाटिगै फूट कि नाई ।
ब्रह्मदत्त विरंचीलोक बसे ललिते यहदुःख कहैं निज गाई २२२
भक्त तुम्हारे चारो होवैं यह बर मिलै मोहिं भगवान ॥
कीरतिसागर मदनताल का पूराचरितकीन हमगान २२३
इति श्रीलखनऊनवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायण
जीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भव
बुधकृपाशङ्करसूनु पं० ललिताप्रसादकृत कीरतिसागर
कीर्त्तिवर्णनोनामद्वितीयस्तरंगः २ ॥
कीरतिसागरका मैदान सम्पूर्ण ॥
इति ॥