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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 460

कीरतिसागरकामैदान । ४५६ ३५
ऐंड़ लगावा जब घोड़े के हौदा उपर पहूँचाजाय ॥
गुर्ज चलावा बीरभुगन्ता सय्यद लैगे चोट बचाय १८२
ढाल कि औझड़ सय्यद मारी नीचे गिरा महाउत आय ॥
तहिले धाँधू तहँ आवत भा औ सय्यदकोदीनहटाय १८३
मारन लाग्यो रजपूतनका धाँधूझाय पिथौरा क्यार ॥
मारे मारे तलवारिन के नदिया वही रक्तकी धार १८४
ना मुँहँ फेरै कनउजवाले ना ई दिल्ली के सरदार ॥
मूडन केरे मुड़चौराभे औ रुण्डनके लगेपहार १८५
शूर सिपाही दुहुँ तरफाके दूनों हाथकरैं तलवार ॥
कायर भागे समर भूमिते अपने डारि डारि हथियार १८६
तहिले माहिल गे तम्बूमें औ पिरथी ते कहाहवाल ॥
जीति न होई महराजाअब आयो देशराज को लाल १८७
ऊदन जावैं जब मोहबे ते तब फिरि चढ़यो पिथौराराय ॥
तुम्हें मुनासिब अब याही है देवो मारु बन्द करवाय १८८
सुनिकै बातें तहँ माहिल की तैसो कियो पिथौराराय ॥
मर्दनि सर्दनि सूरज टंको जूझे समरभूमि में आय १८६
इकसै हाथी गिरे खेतमें घोड़ा जूझे पाँच हजार ॥
लाखयुग्मकी तहँ संख्यामा जूझे दिल्लीके सरदार १६०
रंजित अभई दूनों जूझे घोड़ा जूझे चार हजार ॥
डेढ़ लाख दल पैदल जूझे संख्या मोहबेकी त्यहिबार १६१
छप्पन हाथी मोहबे वाले मारा रहै पिथौराराय ॥
मेख उखरिगै फिरि सागर ते पिरथी कूच दीनकरवाय १६२
तजिकै शंका अहतंका के डंका तुरत दीन बजवाय ॥
कैयो दिनका धावा करिकै दिल्ली गयो पिथौराराय १६३