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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 618 में से

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पृष्ठ 45

४ आल्हखण्ड । ४०
इतनी कहिकै करिया चलिभो फौजन फेरि पहुँचा आय ॥
तुरत नगड़ची को ललकार्यो मारू डंका देय बजाय २१
बजा नगाड़ा तब माड़ो में क्षत्रिन धरा रकावन पायँ ॥
आपो चढ़िकै फिरि घोड़ापर मनमें रामचन्द्र को ध्याय २२
कूच कराय दयो माड़ो सों पहुँचे जाजमऊ में जाय ॥
तम्बू गड़िगे तहँ करिया के चकरन विस्तर दीन बिछाय २३
उतरयो करिया तब तम्बू में मनमें सुमिरि शारदा माय ॥
लैकै धोती रेशमवाली गंगा निकट पहुँचा जाय २४
न्हवन करिकै श्री गंगा में आसन तहाँ लीन बिछवाय ॥
संध्या वन्दन करि प्रातः की विप्रन तुरत लीन बुलवाय २५
दान दक्षिणा दै विप्रन को तम्बू फेरि पहुँचा आय ॥
पहिरिकै कपड़ा अलबेला सो मेला फेरि पहुँचा जाय २६
जाय दुकानन माँ देखतभा कतहुँ न मिला नौलख्यहिहार ॥
तबलों माहिल उरई वाला तासों हैगै राम जुहार २७
माहिल बोल्यो तब करियाते ओ जम्बै के राजकुमार ॥
काह खरीदन को आयो है जो तुम घूमो सकल बजार २८
सुनिकै बातें ये माहिल की करिया बोला वचन उदार ॥
हार लखौटा नीको ढूंढें सो नहिं पावा कतौं बजार २९
बहिनि बिजैसिनि म्वरिमांगहैं ताते खोज करौं अधिकाय ॥
तुम्हरो जानों जो कतहूँ हो मोको वेगि देव बतलाय ३०
सुनिकै बातें ये करिया की माहिल कहा वचन मुसुकाय ॥
हार नौलखा है मोहबे माँ तुरतै चला तहाँको जाय ३१
बहिनि हमारी मल्हना जानों औ बहनोई रजा परिमाल ॥
कऊ लड़ैया तिन घर नाहीं मानों सत्य सत्य सब हाल ३२