आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहोबेकाप्रथमयुद्ध । ३६ ३
त्यहिते तुम का समुझावत हौं बचुवा मानो कहा हमार ॥
राह कनौजी कै तहँते है ठाकुर समरधनी तलवार ६
हाथ जोरिकै करिया बोल्यो दोऊ चरणन शीश नवाय ॥
मने न करिये म्वहिं गंगा को दहुवा बार बार बलिजायँ १०
पार लगे हैं श्री गंगाजी मेरो बार न बांको जाय ॥
पकरो जइहौं जो मेला में पैसा माफ लेउँ करवाय ११
हुकुम जो पावौं मैं दहुवा को तौ फिरि गंगाअवौं अन्ह्याय ॥
बिनती सुनिकै बहु करिया की जम्बै हुकुम दीन फरमाय १२
हुकुम पायकै सो जम्बै को अपने कह्यो सिपाहिन बात ॥
करो तयारी जाजमऊ की गंगा न्हान हेतु हम जात १३
हुकुम पायकै सो करिया का तुरतै होन लागि तय्यार ॥
झीलम बख्तर पहिरिसिपाहिन हाथ म लीन ढाल तलवार १४
यक यक भाला दुइ दुइ बरछी लीन्हेनि कड़ाबीन सबज्वान ॥
बजे नगारा त्यहि सम या माँ भारी होन लाग घमसान १५
करिया चलिभा त्यहि समया माँ माता भवन पहूँचा जाय ॥
हाथ जोरिकै करिया बोल्यो माता चरणन शीशनवाय १६
मोहिं आज्ञा है दंदुवा की गंगा न्हान हेतु हम जायँ ॥
आज्ञा पाऊँ जो माता की तौसब काज सिद्धह्वैजायँ १७
बातैं सुनिकै ये करिया की मातैं हुकुम दीन फरमाय ॥
चूम्यो चाट्यो हृदय लगायो आशिर्वाद दीन हर्षाय १८
बहिनि बिजैंसिनि तब बोलत भै भैया बार बार बलिजाउँ ॥
मोहिं निशानी कछु लैआयो जासों यादिकरुं तव नाउँ १६
इतनी सुनिकै करिया बोला बहिनी मानो कहा हमार ॥
लवों निशानी मैं मेलाते बहिनी कहा न टारौं त्वार २०