सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 444, कुल 618 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 444

कीरतिसागरकोमैदान । ४४३ १६
कोधों तोरत शिवके धनुको जो नहिं होत राम महराज ॥
कछु नहिं शंका मन हमरे में पूरणब्रह्म राम रघुराज ५
माथ नवावों रघुनन्दन को हमपर कृपा करो भगवान ॥
चौंड़ा रंजित का मुर्चा मैं करिहौं सकल अगाड़ी गान ६
अथ कथाप्रसंग ॥
अटा चौंडिया फिरि फाटक पर गरुई हाँक दीन ललकार ॥
पाँव अगाड़ी का डाखो ना ठाकुर मोहबे के सरदार १
डोलादैके चन्द्रावलि को पाछे धरूयो अगाड़ी पाँय ॥
हुकुम पिथौरा का याही है तुमते साँच दीन बतलाय २
इतना सुनिकै अभई बोल्यो चौंड़ा काह गयो बौराय ॥
अस गति नाहीं पृथीराज-कै डोला लेयँ आज मँगवाय ३
खाली मोहबा तुम जान्यो ना मान्यो साँच बचन विश्वास ॥
शूर सराहें त्यहि ठाकुर को जो अब जाय पालकी पास ४
इतना गुनिकै चौंड़ा तुरतै अपनी खैंचिलीन तलवार ॥
पाँव अगाड़ी का डाख्यो ना ठाकुर उरई के सरदार ५
इतना सुनिकै रंजित ठाकुर फौजन हुकुम दीन फरमाय ॥
जान न पावैं दिल्लीवाले इनके देवो मूड़ गिराय ६
हुकुमपायकै यह रंजित का क्षत्रिन खैंचिलीन तलवार ॥
पैदल के सँग पैदल अभिरे औ असवार साथ असवार ७
सूंदि लपेटा हाथी भिड़िगे मारन लागि शूर सरदार ॥
भाला बलछी तीर तमंचा कोताखानी चलै कटार ८
विकट लड़ाई भै फाटक पर नदिया बही रक्तकी धार ॥
ना मुहँ फेरैं दिल्लीवाले ना ई मुहवे के सरदार ६
रंजित अभई की मारुन मा सब दल होनलाग खरिहान ॥