आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० आल्हाखण्ड । ४१४
रही न आशा क्यहु लड़िवेकी आरी भये समरमें ज्वान १०
सवैया ॥
मारत औ ललकारत संगर लंगर भे क्यहु बुद्धि चलैना ।
शूर शिरोमणि रंजित ज्वान सो मान किये रण पैर टरैना ॥
होत जहाँ घमसान महाँ तहँ बीर कोऊ अभिमान करैना ।
माहिल पूत सुपुत जहाँ सो तहाँ ललिते कोउ देखि परैना ११
बड़ा लड़ैया माहिल वाला आला उरई का सरदार ॥
हनि हनि मारे राजपूतन का भारी हाँक देय ललकार १२
चौंड़ा बकशी पृथीराज का सोऊ खूब करै तलवार ॥
चौंड़ा सोहत है हाथी पर अभई घोड़े पर असवार १३
सेल चौंड़िया हनिकै मारा अभई लीन्ह्यो वार बचाय ॥
ऐँड़ लगावा फिरि घोड़े के हाथी उपर पहुँचा जाय १४
ढालकि औझड़ अभई मारा चौंड़ा गयो मूर्छा खाय ॥
भागि सिपाही दिल्लीवाले रंजित दीन्ह्यो फौज बढ़ाय १५
कीरतिसागर मदनताल पर पहुँचा फेरि चँदेला आय ॥
गा हरिकारा ह्वाँ फौजन ते राजै खबरि सुनाई जाय १६
हाल पायकै पृथीराज ने सूरज पूत दीन पठवाय ॥
सूरज आयो जब सागरपै बोल्यो दोऊ भुजा उठाय १७
डोला दैकै चन्द्रावलि का रंजित कूच देउ करवाय ॥
नहीं तो बचिहौ ना संगर मा जो विधि आपु बचावैं आय १८
इतना सुनिकै रंजित बोले सूरज काह गये बौराय ॥
मर्द सराहौं त्यहि ठाकुर का डोला पास जाय नगण्वाय १६
जितनी बिल्ली दिल्लीवाली तिनको देवों समर सुवाय ॥