आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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करों वन्दना पितु माता को दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥
मातु भवानी पितु परमेश्वर वन्दनकिहे स्वर्गकाजाय १६८
निश्चयजिनका पितु मातापर देवी देव सरिस अधिकाय ॥
तिनका जगमा कछुदुर्लभ ना साँचीकहतललितयहगाय १६०
करों वन्दना अब शंकर की ह्याँते करों तरंगको अन्त ॥
राम रमा मिलि दर्शन देवै इच्छा यही भवानीकन्त १६१
इति श्रीलखनऊनवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरआत्मजबाबू प्रयागनारायण
जीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलाँनिवासि मिश्र
वंशोद्भव बुधकृपाशंकरसूनु पण्डितललिताप्रसादकृत रंजित
युद्धागमनवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥ १ ॥
सवैया ॥
दीनदयाल गुपाल कृपाल सुरासुरपाल सुनो महराजा ।
सोवत जागत बैठ जो होहु सुनो विनती तुमहूँ रघुबलामा ।
गाजिरह्यो खल कामबली औ छलीदल मोहके बाजतबाजा ।
राम औ कृष्णभजै ललिते तबहूँ यह जीततहै कलिराजा १
सुमिरन ॥
रक्षा जगकी जो करते ना तौ कस होत नाम जगदीश ॥
ईश्वर होते रघुनन्दन ना कैसे हनत समर दशशीश १
बड़े प्रतापी अंजनि वाले अबहूँ अमर जगत हनुमान ॥
ऐसे अनुचर ज्यहि स्वामी के पूरण ब्रह्म ताहि अनुमान २
रीछ औ बाँदर को सँगमालै जीता बली शत्रु को जाय ॥
शत्रु प्रतापी के भाई को को नर लेय जगत अपनाय ३
को फल खावत घर शबरी के कोधौं तजत आपनी राज ॥
कोधौं तारत तिय गौतम की प्यारी माननीय शिरताज ४