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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 439

१४ आल्हाखण्ड । ५३=
इतनो कहिकै माहिल चलिभे मल्हना रोय उठी अकुलाय ॥
त्यही समैया त्यहि अवसरमा ब्रह्मानन्द पहुँचे आय १४१
मूड़ सूंघिकै रानी मल्हना अपने पास लीन बैठाय ॥
बहिनी ठाढ़ी चन्द्रावलि तहँ नैनन आँसूरही गिराय १४२
रोय कै बोली फिरि मल्हनाते माता साँच देयँ बतलाय ॥
सुजी सिराउब हम सागर मा योगी गये भरोस कराय १४३
साँची वाणी के योगी हैं निश्चय पर्व द्यहैं करवाय ॥
मोहिं भरोसा है योगिन का जो कछु करें सहारा आय १४४
मल्हना बोली चन्द्रावलि तें बिटिया साँच देउँ बतलाय ॥
सुजी सिरावो तुम कुँवनापर दीनौं धर्म दूऊ रहिजाय १४५
इतना सुनिकै बेटी बोली ऐसे कहौ वचन का माय ॥
समरथ भैया हैं ब्रह्मानँद हमरी पर्व द्यहें करवाय १४६
इतना सुनिकै ब्रह्मा बोले साँची साँच देयँ बतलाय ॥
रहौ भरोसे तुम योगिन के जानौं नहीं हमारे भाय १४७
पै हम जावैं जो सागर को आपन मूड़ कटावैं जाय ॥
चढ़ा पिथौरा है सँभरा भर बहिनी काह गई बौराय १४८
जानि बूझिकै को आगी मा आपन हाथ जरावै जाय ॥
बिना बेंड़लाके चढ़वैया मुर्चा देवै कौन हटाय १४६
आल्हा इन्दल लग होते जो तुम्हरी पर्व देत करवाय ॥
मरिगा ठाकुर सिरसावाला सब विधिशूर बनाफरराय १५०
इकले दादा मलखाने बिन यहु दुख परा जानपर आय ॥
होत जो ठाकुर सिरसावालो तौका चढ़त पिथौराराय १५१
शूर न देखा हम दुनिया मा जैसो रहै वीर मलखान ॥
हाथी पटका पिरथी दारे काँपे तहाँ सबै चौहान १५२