आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकीरतिसागरकामैदान । ४३७ १३
फौज तुम्हारी ह्याँ जितनी है सबको भोजन देयँ पठाय ॥
खावो पीवो हरिको ध्यावो जावो हरद्वार को भाय १२६
इतना सुनिकै ऊदन तड़पे चौंड़ा चला तुरत भयखाय ॥
आय कै पहुँचा त्यहि तम्बू मा जहँ पर बैठ पिथौराराय १३०
कही हक़ीकति सब योगिन कै चौंड़ा बार बार समुझाय ॥
सुनी ढिठाई जब योगिन कै माहिलबोले शीशनवाय १३१
अब हम जावत हैं मोहबे को तुम्हरे काज पिथौराराय ॥
इतनी कहिकै माहिल चलिभे पहुँचे फेरि मोहोवे आय १३२
रानी मल्हना ह्याँ महलन मा मनमा बार बार पछिताय ॥
त्यही समइया त्यहि औसरमा माहिलभाय पहुँचाजाय १३३
मल्हना बोली तहँ माहिल ते नीके गयो यहाँपर आय ॥
हाल बतावो अब सागर का चाहत काह पिथौराराय १३४
सुनिकै बातें ये बहिनी की बोला उरई का सरदार ॥
बैठक मांगत है खजुहा की माँगै राजग्वालियरक्यार १३५
उड़न बछेड़ा पाँचो माँगै औरो चहै नौलखाहार ॥
डोलामाँगै चन्द्रावलि का राजा दिल्ली का सरदार १३६
तुम्हरी दिशितें हम पिरथी ते बोल्यन बहुतभांति समुझाय ॥
लाख रुपैया लग लैहैं तुम ह्याँते कूचदेउ करवाय १३७
यह मनभाई नहिं पिरथी के चौंड़ा ताहर उठे रिसाय ॥
जो कछु माँगत महराजा हैं सोई देउ आप मँगवाय १३८
कुशल न मानो तुम मोहोवे कै तिलतिल भूमिलैं खुदवाय ॥
पारस पत्थर पिरथी माँगें बहिनीसाँचदीनबतलाय १३६
ये सब चीजें अब लीन्हे बिन जावें नहीं पिथौराराय ॥
ताहर चौंड़ा की मरजी अस सबियांमोहवालेयँ लुटाय १४०