आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकीरतिसागरकामैदान । ४३६ १५
इतना सुनिकै रानी मल्हना तुरतै छाँड़ि दीन डिंडकार ॥
रंजित बोला तब माता ते गरुई हांक देत ललकार १५३
छाँड़ि भरोसा अब योगिनका हमरे साथ चलो तुम हाल ॥
काह हकीकति है पिरथी कै जबलग रहै हाथ करवाल १५४
मारे मारे तलवारिन के नदिया बहै रक्त की धार ॥
मूड़ न रहै जब देही माँ तबहूँ चली मोरि तलवार १५५
लड़ना मरना रजपूतन का युग युग यही धर्म व्यवहार ॥
प्राण न रहैं जब देही माँ तबहीं मिटी म्वार व्यवहार १५६
साँची साँची हम बोलत हैं माता शपथ तुम्हारी खाय ॥
कीरतिसागर मदनताल पर बहिनीसाथचलौतुममाय १५७
जो नहिंजैहौ तुम सागर को रंजित मरी जहर को खाय ॥
मर्द मर्दई ते चूका जो तौफिरजियत मृत्युहैजाय १५८
देही रहै नहिं दुनिया माँ कीरति बनी रहै सब काल ॥
मोहिं पियारी सबइ कीरति है साँचीशपथखाउँमहिपाल १५६
सुनि सुनि बातें ये बेटा की मल्हना हैगै हाल बिहाल ॥
बेटा अभई माहिल वाला बोला बचन सांचत्यहिकाल १६०
हमहूँ चलिबे तुम्हरे सँग मा साँचे बचन बतावैं भाय ॥
आजु मोहोबा खाली लखिकै गांसा आय पिथौराराय १६१
आल्हा ऊदन हैं कनउज मा ह्यां मरिगये बीरमलखान ॥
अब हम लूटैं खूब मोहबे को सोची भली वीर चौहान १६२
पै नहिं जानत हैं अभई का जबलग रही हाथ तलवार ॥
तवलग मारब हम क्षत्रिनका नदिया बही रक्तकी धार १६३
करो तयारी अब सागर की फूफ़ू सांच देयँ बतलाय ॥
काह हकीकति है पिरथी कै गड़बड़ करै परबमें आय १६४