आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ आल्हखण्ड । ४३६
इतना सुनिकै पृथीराज ने चौंड़ा धांधू लीन बुलाय ॥
भल समुझावा तिन दोउनका यहु महराज पिथौराराय ११७
दोऊ चढ़िकै तहँ हाथिन मा तहँते कूच दीन करवाय ॥
जायकै पहुँचे फिरि झाबर मा जहाँपर योगिनकासमुदाय ११८
चौंड़ा बोला तहँ ऊदन ते योगी हाल देउ बतलाय ॥
कहाँते आयो औ कहँ जैहौ काहे डेरा दीन गड़ाय ११९
ऊदन बोले तब चौंड़ा ते ठाकुर हाथी के असवार ॥
हम तो आये बंगाले ते जावैं हरद्वार यहिवार १२०
पै हम रहिबे ह्याँ पंद्रादिन तुमते साँच दीन बतलाय ॥
मल्हनारानी इक मोहबे मा ताकी परख देब करवाय १२१
है खलभल्ला औ हल्लाअति की चढ़ि अवा पिथौराराय ॥
कीन प्रतिज्ञा हम मोहबे मा तुम्हरी परख देब करवाय १२२
साँची करिबे हम वानी का ताते टिकैब यहाँ पर भाय ॥
कहाँ के ठाकुर तुम दोऊ हौ हमते साफ देउ बतलाय १२३
फौज देखिकै वैरागिन कै दोऊ लागि मनै पछिताय ॥
कौन हटाई वैरागिन का सम्मुख समरभूमिमें जाय १२४
जौन बनावा महराजा ने योगिन सबई दीन बतलाय ॥
कैसे टरिहैं ये झाबर ते यह नहिं चित्तठीकठहराय १२५
चौंड़ा धांधू फिरि बोलत भे योगिन बार बार समुझाय ॥
करें बखेड़ा कहुँ योगी ना ताते कूच देउ करवाय १२६
कह्यो पिथौरा यह हमते है योगिन जाय देउ समुझाय ॥
कूच करावैं उइ झाबर ते नाहक रारि मचावैं आय १२७
लड़ना मरना रजपूतन का युग युग धर्म यहै है भाय ॥
युद्ध न चहिये वैरागिन को ताते कूच देउ करवाय १२८