आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ आल्हखण्ड। ४० =
चिन्ता ठाकुर रुसनी वाला ताको जीति लीन फिरिजाय ॥
बजे नगारा हहकाराके तहँ ते चला बनाफरराय १८३
आयकै पहुँचा फिरि गोरखपुर सबियाँ शहर लीन घिरवाय ॥
सूरजठाकुर गोरखपुर का ऊदन लीन तहाँ बँधवाय १८४
तहँते चलिकै पटना आवा यहु रणबाघु बनाफरराय ॥
पूरन राजा पटना वाला ताको कैदलीन करवाय १८५
चला बनाफर फिरि तहँना ते काशीपुरी पहुँचा आय ॥
धन्य बखानैं हम काशी का मनमेंशिवाचरणकोध्याय१८६
अज अबिनाशी घट घट बासी पूरण ब्रह्म शम्भु करतार ॥
परम पियारी निज काशी के आजौ सत्य सत्य रखवार १८७
रहे भास्करानंद स्वामी हैं सबके माननीय शिरताज ॥
अब लग काशी हम देखी ना ना कछुपरा क्यहूने काज १८८
वर्ष अठारा कीन नौकरी बाबू प्रागनारायण धाम ॥
छपीं पुस्तकैं ह्याँ जितनी हैं ते सब पढ़ा पेटके काम १८६
सुनी बड़ाई भल काशी की दासी सरिस मुक्ति तहँ भाय ॥
तौनी काशी अविनाशी मा ऊदन तम्बू दीन गड़ाय १६०
हंसामनि काशी का राजा ऊदन कैद लीन करवाय ॥
मारू डंका फिरि बजवाये कनउज चला बनाफरराय १६१
तीनि महीना औ तेरा दिन गाँजर खूब कीन तलवार ॥
बारह राजन को कैदी करि पठवा जयचंद के दरबार १६२
बोला मारग में लाखनि ते बेटा देशराज को लाल ॥
हम पर साँकर जहँ कहुँ परि है लाला रतीभानके लाल १६३
बदला देहौ की मुरिजैहौ लाखनि साँच देउ बतलाय ॥
सुनिकै बातें बघऊदन की लाखनिगंगशपथगाखाय १६४