आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगाँजरकीलड़ाई । ४०६ १६
साथ तुम्हारो साँचो देहैं प्यारे उदयसिंह तुम भाय ॥
करत बतकही द्वउ मारग में कनउजशहर पहूँचे आय १६५
अनँद बधैया घर घर बाजीं सबहिन कीन मंगलाचार ॥
पूरि लड़ाई भै गाँजर कै रक्षा करें सिया भर्त्तार १६६
खेत छूटिगा दिननायक सों झएडागड़ा निशाको आय ॥
आशिर्वाद देउँ मुन्शीसुत जीवो प्रागनारायणभाय १६७
रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥
मालिक ललिते के तबलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर १६८
माथ नवात्रों पितु अपने को जिन बल गाथ भई तय्यार ॥
बड़े यशस्वी पितु हमरे हौ साँचे धर्म कर्म रखवार १६६
करों तरंग यहाँ सों पूरण तवपद सुमिरि भवानीकन्त ॥
शम रमा मिलि दर्शन देवो इच्छा यही मोरि भगवन्त २००
इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू
प्रयागनारायणजीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलां
निवासिमिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनुपण्डितललिताप्रसाद
कृत गाँजरयुद्धवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥
गाँजर का युद्ध समाप्त ॥
इति ॥