आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगॉजरकीलड़ाई । ४०७ १७
मुरली मनोहर दोउ भाइन को तहँ पर कैदलीन करवाय ॥
सुन्दर फाटक जौन अटकको त्यहिको तोपनदीनउड़ाय।७३
माल खजाना ताको लैकै तहँ ते कूच दीन करवाय ॥
आयकै पहुँचे फिरि जिन्सी में तम्बू तहाँ दीन गड़वाय ।७४
बाजे डंका अहर्तका के हाहाकार शब्द गा छाय ॥
राजा जगमनि जिन्सीवाला सोऊगयो समरको आय।७५
सवैया ॥
औ ललकार कियो रण में तुम ठाकुर काहे ग्रस्यो मम ग्रामा ।
काह तुम्हार चहैं रणनाहर तौन बताय कहौ यहि ठामा ॥
ऊदन बोलि उठा ततकाल सुनो नृप सुन्दरि बात ललामा ।
द्वादश अब्द भये तुमको नृप जयचंदको न दियो कछु दामा।७६
पैसा बाकी सब दैदेवौ तौ हम कूच देयँ करवाय ॥
इतना सुनिकै जिन्सी वाला शूरनबोला बचन सुनाय ।७७
मारो मारो ओ रजपूतो यहही ठीक लीन ठहराय ॥
झुके सिपाही दोनों दल मा मारैं एक एक को धाय ।७८
चली सिरोही भल जिन्सी मा लागे गिरन शूर सरदार ॥
को गति बरणै त्यहि समया कै आमा झोर चलै तलवार ।७६
मूड़न केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ॥
मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार ।८०
घोड़वेंदुला का चढ़वैया आल्हा केर लहुरवा भाय ॥
जीति लड़ाई मा जगमनि को तुरतै कैद लीन करवाय १८१
बांधिकै मुशकें तहँ जगमनि की तुरतै कनउज दीन पठाय ॥
मालखजाना सब जगमनि का ऊदनतुरत लीनलुटवाय १८२