आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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छोटे भाई हम आल्हाके राजन साँच दीन बतलाय ॥
बाकी दैदो तुम जयचँद कै हम सब कूचदेयँ करवाय १४२
इतनी सुनिकै राजा बोले मानो कही बनाफरराय ॥
झंपी कौड़ी तुम पैहौ ना टेटुवा टायेर लेयँ लुटाय १४३
कहाँ मंसई तुम करिआये ऊदन नाम सुनावै भाय ॥
तुम अस ऊदन बहुतैरन को रणमा मारा खेत खिलाय १४४
सवैया ॥
सुनिकै यह वानि कहा बघऊदन साँचसुनै नृप बात हमारी ।
सेतु बँधा जहँ पय रघुनन्दन बेंदुल टाप तहाँलग धारी ॥
जयपुर जीति लुटाय लियों दतिया औ उरैछा भये सब आरी ।
पृथिराजकी शानकमान बढ़ी ललिते तिनद्वार गयंद पछारी १४५
झन्ना पन्ना को जीता हम जीता काश्मीर सुल्तान ॥
थहर थहर सब बूँदी काँपै झंडा अटकपार फहरान १४६
देश देश सब हम मथिडारे मारे हेरि हेरि नरपाल ॥
पैसा लेवैं जब संगर में तबहीं देशराज के लाल १४७
इतना कहिकै उदयसिंह ने तुरतै हुकुम दीन फर्माय ॥
जान कामरू के पावै ना इनके देवो मूड़ गिराय १४८
भा खलभल्ला औ हल्ला अति लागी चलन तहाँ तलवार ॥
पैदल पैदल कै बरणी मै औअसवार साथ असवार १४६
सूँड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे अंकुश भिड़े महौतन केर ॥
हौदा हौदा यकमिल द्वैगे मारैं एक एक को हेर १५०
गाफिलदेख्यो कमलापतिको ऊदन कैद लीन करवाय ॥
बांधिकै मुशकें महराजा की कनउज तुरत दीन पठवाय १५१