आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरेशम रसन सों कसिकै फिरि साँलों सीढ़ी दीन लगाय ॥
बारह कलशन की अम्बारी तिनपर धरी तुरतही जाय २१
घण्टा बांधे तिन के गर माँ क्षत्री होन लागि असवार ॥
भूरी हथिनी लखराना की सोऊ बेगि भई तय्यार २३
चन्दन सीढ़ी तामें लागी वामें लाखनि भये सवार ॥
हाथी सजिगा जब आल्हा का हाथ म लई ढाल तरवार २४
मनमाँ सुमिरयो जगदम्बा का अम्बा लाज तुम्होरे हाथ ॥
बैठ्यो हाथी पर आल्हा जब नायो रामचन्द्र को माथ २५
हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे घोड़न होन लागि असवार ॥
घोड़ बेंदुला की पीढ़ी पर चढ़िगो द्यावलिकेर कुमार २६
घोड़ पपीहा मोहबे वालो तापर जोगा भयो सवार ॥
हंसामनि घोड़ा के ऊपर इन्दल आल्हा केर कुमार २७
घोड़ मनोहर पर देबा है भोगा सबजा पर असवार ॥
या बिधि सेना सब इकटौरी बारहलाख भई तय्यार २८
मारू डङ्का बाजन लागे घूमन लागे लाल निशान ॥
कऊ नालकिन कऊ पालकिन कोऊ चढ़े साँड़िया ज्वान २६
आगे हलका है हाथिन का बलका तिनके नाहिं ठिकान ॥
घण्टा बाजैं गल हाथिन के जहँ सुनिपरै बात नहिं कान ३०
चिंघरति हाथी आगे चलि भे पाछे घोड़न चली कतार ॥
सरपट घोड़ा कोउ दउरावै कावा देवै कोऊ सवार ३१
कोउ मन पावै असवारे का तौ असमान पहुँचै जाय ॥
कोउ कोउ घोड़ा हंस चालपर कोउकोउमोरचालपरजाय ३२
खुर खुर खर खर कै रथ दौरैं चह चह रहीं धुरी चिल्लाय ॥
छाय अँधेरिया गै दशहू दिशि आपनपरै न हाथ दिखाय ३३