आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
DevanagariHindipublished618 पृष्ठ
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३६ आल्हखण्ड । ३५२
रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहै चन्द औ सूर ॥
मालिक ललिते के तबलों तुम यशसों रहौ सदाभरपूर २३७
माथ नवावौं पितु अपने को ह्यांते करौं तरँग को अन्त ॥
राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त २३८
इति श्रीलखनऊनिवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबू प्रयागनारायण
जीकीआज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गत पँडरीकलां निवासि मिश्रवंशोद्भव
बुध कृपाशङ्कर सूनु पं० ललिताप्रसादकृत इन्द्लपाणिग्रहण
बर्णनोनामद्वितीयस्तरंगः २ ॥
इन्दलहरण सम्पूर्ण शुभमस्तु ॥
इति ॥