आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइन्दलहरण । ३५१ ३५
सवैया ॥
आमको खम्भगड़ो तहँ सुन्दर माड़व मालिन ठीक बनायो ।
कै गठि बन्धन बैठिगयो नृप स्वच्छ कुशानिज हाथ उठायो ॥
दान दयेउ कन्या अभिनन्दन वन्दन कै रघुनाथ मनायो ।
चन्दन अक्षत फूलनलै ललिते मनमोद गणेशचढ़ायो २२७
बड़ी खुशी सों अभिनन्दनने बेटी ब्याह दीन करवाय ॥
बिदा करायो चितरेखा को औधनदीन्ह्योखूब लुटाय २२८
भये अयाचक सब याचक गण जय जयकार रहे सब गाय ॥
बाजे डंका अहर्तंका के आल्हा कूचदीनकरवाय २२६
एक महीना के भीतर में दशहरि पुरै पहुंचे आय ॥
घरछन करिकै दरवाजे सों सुनवाँ लैगय वधूलिवाय २३०
दगीं सलामी की तोपैं बहु ध्रुवना रहा रगमें छाय ॥
मनियादेवन की पूजाकरि बैठीं धाम आपने आय २३१
आल्हा बैठे फिरि महलन में ऊदन बैठे शीश नवाय ॥
माहिलठाकुर की गाथा को आल्हाठाकुर दीनसुनाय २३२
चुगुलशिरोमणि माहिलठाकुर ठाकुर रहे तहाँ सब गाय ॥
होय भलाई मम चुगुलिन में इतनाकहा ललुरवाभाय २३३
खेत छूटिगा दिन नायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥
ब्याहपूर भा अब इन्दल का सुमिरौं तुम्हें शारदामाय २३४
पारलगायो महरानी तुम दानीयुगन युगन अधिकाय ॥
कोउअभिमानीजगरहिगा ना ज्यहिपरकोपकीनतुममाय २३५
आशिर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनरायण भाय ॥
हुकुम तुम्हारो जो पावत ना ललितेकहतकथाकसगाय २३६