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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 342

इन्दलहरण । ३३६ २३
जो कछु कहैं चाचा हमरे सो नहिं टरै भूमिटरिजाय ८५
बेटी बोली फिरि ऊदन ते चाचा साँच देयँ बतलाय ॥
किरिया करलो तुम आवनकी तौ फिरि जाबो इन्हेंलिवाय ८६
सुनिकै बातें चितरेखा की ऊदन गङ्गालीन उठाय ॥
सुवा बनायो तब बेटी ने पिंजरा तुरत दीन बैठाय ८७
मन्त्र बतायो फिरि ऊदन को औ लै पिंजरा दीन गहाय ॥
ऊदन चलिभे फिरि महलन ते पहुँचे फेरि द्वार में आय ८८
पिंजरा दीख्यो जब देवाने तब मन खुशीभयोअधिकाय ॥
गीत बंदभे फिरि योगिन के तहँते कूच दीन करवाय ८६
चारो योगी चलि मारग में बैठे एक बृक्षतर जाय ॥
बाहर पिंजरा के सुवना करि ऊदन मानुष दीन बनाय ६०
मानुष हैगे बघइन्दल जब तब सब खुशीभये अधिकाय ॥
विदाममांगि कै कान्तामल फिरि कुन्नागढ़ै पहुँचा जाय ६१
ऊदन देवा इन्दल मकरँद चारो चले तहाँते ज्वान ॥
आयकै पहुँचे सिरसागढ़ में जहँपर बसै वीरमलखान ६२
मलखे दीख्यो जब ऊदन को भेंट्यो बड़े प्रेमसों आय ॥
देवा बोल्यो मलखाने ते तुम सुनिलेउ बनाफरराय ६३
विपदा आई जब ऊदन पर फाटक बन्द लीन करवाय ॥
यहु दिन लायो नारायण जब तब तुम मिले बनाफरराय ६४
कोऊ विपदामा साथी ना साँचो साँच परा दिखराय ॥
मलखे बोले तब देवा ते तुमको साँच देयँ बतलाय ६५
लषण राम की तुम गाथा को जानो भलीभांति सरदार ॥
छोटेभाई हम आल्हा के यह सब जानिगयो संसार ६६
करें लड़ाई बड़भाई ते तौ सब क्षत्रीधर्म नशाय ॥