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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 341, कुल 618 में से

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पृष्ठ 341

[Header] २२ आल्हखण्ड । ३३८

मोहिं तपस्या को बल पूरो तुमहूँ राख्यो नाहिं छिपाय ७३
भूत भविष्यत बर्त्तमान की गाथा सबै सकैं बतलाय ॥
बातें सुनिकै ई योगी की बेटी पिंजरा लई उठाय ७४
करिकै बाहर फिरि पिंजराके तुरतै मानुष दीन बनाय ॥
यही तरासों नित प्रति बेटी निशि में पास लेय पौढ़ाय ७५
इन्दल दीख्यो जब ऊदन को तब यह बोल्यो बचन सुनाय ॥
धोखे भूले ना योगी के चाचा यहाँ पहुँचे आय ७६
बातें सुनिकै ये इन्दल की बेटी मूड़ लीन निहुराय ॥
ऊदन बोले तब बेटी ते तुम्हरो ब्याह देब करवाय ७७
सुवा बनावो तुम इन्दल को हम को मंत्र देउ बतलाय ॥
परो उदासी है मोहबे में करिवे ब्याह वहाँते आय ७८
बेटी बोली तब ऊदन ते चाचा साँचेयँ बतलाय ॥
डोला हमरो पहिले जाई तौ हम मानुष देब बनाय ७६
नहीं तो कन्ता अब जैहैंना रैहैं सदा हमारे पास ॥
वारा बरसै जब तप कीनी तब विधि पूरिकीन मम आश ८०
कैसे जीवे बिन स्वामी के चाचा कहैं छोड़िकै लाज ॥
इतना सुनिकै ऊदन बोले बेटी धरो धीर मनआज ८१
चोरी चोरा म्वहिं भावै ना तुमने साफ देयँ बतलाय ॥
कौन डसरिहा उदयसिंहको रोंकी ब्याह यहाँपर आय ८२
बांधिकै मुशकें अभिनन्दनकी भौंरी तुरत लेव करवाय ॥
देश देश औ जगमें जाहिर नामी सबै बनाफरराय ८३
महिनाभर के फिरि अर्सा में ह्याँपर ब्याह करब हम आय ॥
इन्दल बोले चितरेखा ते यहही ठीकठाक ठहराय ८४
कहा न टारो तुम चाचाको तौ विधि फेरि मिलै हैं आय ॥