आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ आल्हखण्ड ।
हवै भलाई डोला दीन्हें नहिं शिर कालरहा मन्नाय. १५
सुनिकै बातैं ये धावन की बोला तुरत कनौजीराय ॥
खवरि सुनावो तुम पिरथी को डाँड़ने कूच देयँ करवाय १६
जितनी राँड़ें लड़आये हैं सो बिन घाव एक ना जायँ ॥
खेदिकै मारों मैं दिल्ली लौं नेका टका लेउँ निकराय १७
दहीके धोखे कहुँ भूलैना जो वै जायँ कपास चबाय ॥
शूर सिपाही हैं कनउज के जिनका दीखे काल डेराय १८
सुनिकै बातें महराजा की धावन चला शीशको नाय ॥
खवरि सुनाई सब जयचँद की सुनि जरिमरा पिथौराराय १६.
हुकुम लगायदद्यो क्षत्रिन को क्षत्री कमरबन्ध तय्यार ॥
लड़ने मरने के सब लायक एकते एक शूर सरदार २०
मारू बाजा बाजन लागे घूमनलागे लाल निशान ॥
भयो सवार तुरत हाथीपर ठाकुर समरधनी चौहान २१
तीर कमान लयो हाथेमाँ कम्मर बँधी ढाल तलवार ॥
को गति वरणै तब पिरथी कै नाहर दिल्ली का सरदार २२
घूमन लाग्यो सब मुर्चन माँ तोपन गोला दीन भराय ॥
त्यही समइया त्यहि औसरमाँ यहु रणवाधु कनौजीराय २३
हुकुम लगायो रजपूतन को जल्दी कूच देउ करवाय ॥
आपौ चढ़िकै फिरि हाथीपर मनमाँ श्रीगणेशकोध्याय २४
चलिभो लश्कर सब कनउजते औ मुर्चा में पहुँचे आय ॥
बम्ब के गोला छूटन लागे हाहाकार शब्द गा छाय २५
को गति वरणै तब तोपनकै धुवना रहा सरग मड़राय ॥
गोला लागै जिन हाथिन के मानों गिरैं धौरहर आय २६
गोला लागै जिन ऊंटन के ते मुँहभरा गिरैं अललाय ॥