आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंयोगिनिस्वयंम्बर । २७
जौने बैलके गोला लागै मानों मगर कुल्याँचै खाय २७
जौने बछेड़ा के गोला लागै आधे सरग लिहे मड़राय ॥
गोला लागै ज्यहि क्षत्री के साथै उड़ाचील्ह असजाय २८
बड़ी दुर्दशा भै तोपन में हाहाकारी शब्द सुनाय ॥
दोनों दल आगे को बढ़िगे तोपन मारु बन्द है जाय २९
गोला ओला सम बरसत भे सन सन सन्नकार गा ळाय ॥
चलैं बंदूकैं बादलपुरकी जो नब्बेकी एक बिकाय ३०
मघा नखत सम गोली बरसैं डोलिन घहिया जायँ उठाय ॥
को गति वरणै बन्दूखन की हमरे बूत कही ना जाय ३१
दूनों दल आगेको बढ़िगे संगम भये शूर सरदार ॥
सूँढ़ि लपेटा हाथी भिड़िगे अंकुशभिड़े महौतनक्यार ३२
हौदा हौदा यकमिल हैगे क्षत्रिन खैंचि लीन तलवार ॥
भाला वरछिन सों कउ मारैं कोऊ लेयँ ढालकी वार ३३
सूँढ़ि लपेटे जंजीरन को हाथी रणमा रहे घुमाय ॥
लागि अँजीरै जिनके जावैं तिनके अंग भंग है जायँ ३४
मस्तक मस्तक गजके मारैं अद्भुत समर कहा ना जाय ॥
भाला छूटे असवारन के खन खन ठन्न ठन्न गा ळाय ३५
चम चम चमकैं तलवारी तहँ मर मर रगड़ ढालकी होय ॥
घम् घम् घम् घम् बजैं नगारा बोलैं मारु मारु सब कोय ३६
खट खट खट खट तेगा बोलैं बोलैं छपा छप्प तलवार ॥
झल् झल् झल् झल् झलूरी झलकैं तिनसों होयतहाँ उजियार ३७
ज्यहिकी वारन जो चढ़ि जावै सो हनिदेय ताहि तलवार ॥
अपन परावा कछु सूझैना दोनों हाथ होय तहँ मार ३८