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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 30

संयोगिनिस्वयम्बर। २५
पहिरि सिपाही झिलमैलीन्ह्यो हाथ म लई ढाल तलवार ३
कच्छी मच्छी नकुला सब्जा हरियल मुश्की घोड़ अपार ॥
साजन लागे सब जल्दी सों जिनका तनक न लागैबार ४
डारि हयकलैं तिनके गलमा मुखमा दीन लगाम लगाय ॥
गंगा यमुनी छाँड़ि रकाबैं पूंजी पटा दीन पहिराय ५
नाल ठोकाई तिनके सुम्मन रेशम तंग दीन कसवाय ॥
को गति बरणै तिन घोड़न कै हमरे बूत कही ना जाय ६
हंथी महावत हाथी लै कै तिनका दीन तुरत बैठाय ॥
चुम्बक पत्थर का हौदा धरि जिनमें सेल बरौंवा खाय ७
साजि साँड़िया सब जल्दी सों छकरन लीन बरुद भराय ॥
बड़ी बड़ी तोपैं अष्टधातु की गोला एक मनाको खायँ ८
बैल नहाये तिन तोपन में औ डाँड़े को दीन हँकाय ॥
जागा राजा कनउज वाला मनमाँ श्रीगणेशको ध्याय ६
उठिकै महलन सों जल्दी सों औ दरबार पहूँचा आय ॥
हम्माँ जमाँ औ रायलंगरी इनका लीन्ह्यों तुरतबुलाय १०
सुद्धत ठाकुर रतीभान औ दोऊ आंय गये दरबार ॥
माथ नवायो महराजा को दोऊ बड़े शूर सरदार ११
हाथ जोरिकै मंत्री बोल्यो राजन मानो बचन हमार ॥
हाथी घोड़ा सजे सिपाही छकड़ा नहे ठाढ़ तय्यार १२
धावन पठयो पृथीराज ने सो दरबार पहूँचा आय ॥
हाथ जोरिकै धावन बोल्यो ओ महराज कनौजीराय १३
मोहिं पठायो पृथुइराज ने औ यह कह्यो बात समुझाय ॥
डोला दैदें संयोगिनि का तौ हम लौटि धामको जायँ १४
नाहिंतो बचिहैं ना कनउजमाँ जो विधि आपु बचावै आय ॥