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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 297

१२ आल्हखण्ड । २६४
आपन दीन्ह्यो बहनोई को ताको लीन्ह आप सरकाय ११९
यह गति देख्यो बहनोई जब तब अतिबोल्यो क्रोध बढ़ाय ॥
हमरो भोजन तुम कस लीन्ह्यो अपनो दीन्ह्यो हमें उठाय १२०
इतना सुनिकै ऊदन बोले ठाकुर साँच देयँ बतलाय ॥
उचित हमारे यही देशमें सोई कीन यहॉपर आय १२१
इतना सुनिकै इन्द्रसेन ने अपनो पाटा लीन उठाय ॥
पीठिम मारा बघऊदन के बोला यहै रीति है भाय १२२
देखि तमाशा ऊदन ठाकुर अपनो गडुवा लीन उठाय ॥
कुमक आयगै बीरशाह कै परिगो गाँस बनाफरराय १२३
मर्द मर्दईते चूकै ना चहु निर्दई दई है जाय ॥
नरपुर गाथा घर घर गावैं सुरपुर वास मर्दका आय १२४
कीन मर्दई बघऊदन ने बहुतक क्षत्री दिये गिराय ॥
कोठे परते तलवारी को चन्द्रावलिने दीन गहाय १२५
सो लै लीन्ह्यो बघऊदन ने मारन लाग बनाफरराय ॥
इकले ऊदन के मुर्चापर कोई शूर नहीं समुहाय १२६
उचित न मारब बहनोई का । ऊदन ठीक लीन ठहराय ॥
पाय दुचित्ता बघऊदन को बंधन तुरत लीन करवाय १२७
जायकै डाख्यो फिरि खन्दक में पहरा चौकी दीन कराय ॥
देखि दुर्दशा यह ऊदन कै बहिनी बारबार पछिताय १२८
मन में शोचै मनै विचारै कासों कहै दुःख अधिकाय ॥
तवलों मालिनि पोहपा आई ऊदन कथा गई सब गाय १२६
ऐसो पाहुन ऐसि दुर्दशा हमते कछू कहा ना जाय ॥
को समुझावै महराजा को आपन देवै प्राण गँवाय १३०
सुनिकै बातें ये मालिनि की तब चन्द्रावलि कह्यो सुनाय ॥