आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 288, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ेंचन्दावलि की चौथि। २८५ ३
इतना सुनिकै मल्हना बोली ऊदन साँच देयँ बतलाय ११
लाग महीना अब सावन को गावन लगे नारि नर गीत ॥
सुधि जब आवै चन्द्रावलि की तबहीं लेय मोह दलजीत १२
कठिन यादवा बौरीगढ़के जिनके लूटि मार का काम ॥
बेटी ब्याही तिनके घरमाँ कबहुँन लखी आपनोधाम १३
चौथि पठावैं जो बौरीगढ़ तौ फिर होय वहाँ पर मार ॥
है बहनोई इन्द्रशाह तब ताके परी बांट है रार १४
गउना रउना सबके आवैं बेटी परी मोरि ससुराल ॥
इतना सुनिकै ऊदन बोले माता मानो कही हमार १५
चौथी लैके बौरी जैबै बहिनी बिदा लेव करवाय ॥
अब मैं जावों महाराजा ढिग माँगों बिदा बेगिही जाय १६
इतना सुनिकै मल्हना बोली मानो कही बनाफरराय ॥
मोहिं पियारी अस बेटी ना जो तुम जाउ लहुरवा भाय १७
कछु तुम कहियो ना राजाते ना बौरी को होउ तयार ॥
प्राण पियारे तुम ऊदनहौ साँची मानो कही हमार १८
सुनिकै बातें ये मल्हना की ऊदन चले जहाँ परिमाल ॥
हाथ जोरिकै उदयसिंहने औ राजाते कहा हवाल १६
हम अब जैहैं बौरीगढ़ को बहिनी बिदा करैहैं जाय ॥
कहा न मानब हम काहूको राजन हुकुम देउ फरमाय २०
बातैं सुनिकै बघऊदन की तुरतै उठा चँदेलाराय ॥
साथै लैके बघऊदन को फिरि रनिवास पहुँचाआय २१
डाटन लाग्यो तहँ मल्हनाको री कस जौहर दीन लगाय ॥
ऊदन जैहैं चलिबौरी को बेटी बिदा करैहैं जाय २२
इवैं लुटेरा बौरी वाले ओ बइलानी बात बनाय ॥