सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 239, कुल 618 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 239

विदा कि विरिया अब आई है यह मोहिं कह्यो चँदेलोराय ६२
यहु संदेशा हम लाये हैं ओ महराज पिथोराराय ॥
जो कछु उत्तर तुम ते पावैं राजै सर्वइ सुनावैं जाय ६३
बातें सुनिकै ये रूपन की बोले पृथीराज महराज ॥
देश हमारे की रीती यह पुरिखन कियो अगारी काज ६४
ब्याह के पीछे गौना देवैं तबहीं होवै पूर विवाह ॥
यहतुम कहियो परिमालिक ते ऐसे कहे बचन नरनाह ६५
धन्य बखानैं हम आल्हा को सातो भाँवरि लियो कराय ॥
हैं सब लायक मलखे ठाकुर हमरो कहौ संदेशो जाय ६६
सुनिकै बातें पृथीराज की रूपन चला तुरत शिरनाय ॥
आयकै पहुँच्यो त्यहि तम्बू में ज्यहि में रहैं चँदेलेराय ६७
आल्हा ऊदन मलखे सुलखे बैठे लिहे ढाल तलवार ॥
जोगा भोगा मन्नागूजर जगनिक भैने चँदेलेक्यार ६८
जो संदेशा पृथीराज का रूपन सो गा सबै सुनाय ॥
सुनिकै बातें पृथीराज की भा मन खुशीं चँदेलोराय ६६
हुकुम लगायो फिरि लश्कर में क्षत्री कूच देयँ करवाय ॥
मानि आज्ञा परिमालिक की आल्हा कूच दीन फरमाय १००
कूच क डंका तब बाजत भो क्षत्री सबै भये हुशियार ॥
हथी चढ़ैया हाथी चढ़िगे बाकी घोड़न भे असवार १०१
बाजे डंका अहलंका के घूमन लागे लाल निशान ॥
बैठि पालकी ब्रह्मा चलि भे साथै चले वीर मलखान १०२
ढोल औ तुरही कै गिनती ना बाजन कीन घोर घमंसान ॥
ग्यारा रोज कि मैजलि करिकै मोहवे आये बराती जवान १०३
आगे चलिकै रूपनबारी मल्हना महल पहुँचा आय ॥