आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] ब्रह्माका विवाह । २३७ ४१
कुशल प्रश्नसों सब जन आये रूपनबोला शीश नवाय १०४
बड़ी खुशाली भै मल्हना के तुरतै सखियाँ लीन बुलाय ॥
चौमुख दियना रानी बारे पहुंची तुरतद्वारपर आय १०५
बारह रानी परिमालिक की गावन लगीं मंगलाचार ॥
पलकी आई ब्रह्मानँद की परछन होनलगी तबद्वार १०६
भई आरती ब्रह्मानँद की सबियाँ याचक भये निहाल ॥
जितनी रैयति मोहबे वाली आये ज्वान वृद्ध औ बाल १०७
भयो बुलौवा फिरि पंडित का धावन चला तड़ाका धाय ॥
लै कै पत्रा पंडित आवा साइति ठीकदीन बतलाय १०८
महलन पहुंचे ब्रह्माठाकुर विप्रन मोदभयो अधिकाय ॥
दान दक्षिणा मल्हना दीन्हे सीधा घरै दीन पहुँचाय १०६
दगीं सलामी दरवाजे पर धुँवना रहा सरगमें छाय ॥
बिदा मांगिकै नेवतहरी सब निजनिजदेशपहुंचेजाय ११०
दशहरिपुरवा आल्हा पहुंचे सिरसा गये वीर मलखान ॥
कथा पूरी भै अब ब्याहे कै मानो सत्यवचन परमान १११
खेत छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥
तारागण सब चमकनलागे सन्तन धुनी दीन परचाय ११२
परे आलसीखटिया तकि तकि घों घों कण्ठ रहे घर्राय ॥
भल बनिआई तहँ योगिन कें निर्भयरहे रामयशगाय ११३
निशा पियारी सब योगिनको चोरन अर्द्धमास की भाय ॥
कछु नहिंभावै मनबिरहिन कें उनको कालरूपदिखराय११४
सदा सहायक पितु अपने को दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥
आशिर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनारायण भाय ११५
रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥