आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० | आल्हखण्ड । २२६
जो कछु भाषा पृथीराज ने | ऊदन जाय कह्यो सब हाल १७७
सुनी हकीकति जब माहिल सब | पहुंचा पृथीराज के पास।
बड़ी उदासी सों बोलत भा | राजा करो बचन विश्वास १७८
ब्याह जो होइहै ब्रह्मानँद का | होइहै बड़ा जगत उपहास॥
भेटन आवैं परिमालिक जब | तब तुम करो द्वारपर नाश १७६
इतना कहिकै माहिल चलिभे | अब ऊदनके सुनो हवाल॥
सुनिकै बातें बघऊदन की | बोले तुरत रजा परिमाल १८०
ताकत हमरे अस नाहीं है | जो हम मिलैं द्वार समध्वार॥
गजभर छाती पृथीराज की | क्यहिके जमे करजे बार १८१
रह्यो भरोसे तुम हमरे ना | मानो कही बनाफरराय॥
मलखे बोले तब आल्हा ते | दोऊ हाथ जोगि शिर नाय १८२
भयो हँसौवा अब दिल्ली माँ | दादा साँच परे दिखराय॥
ऐसी बातें राजा बोलैं | सो तुम सुनी रह्यो है भाय १८३
अब तुम चलिहौ समध्वारे को | तौ सब बात यहाँ रहिजाय॥
हँसिहैं दिल्ली में नरनारी | भारी विपति परी अब आय १८४
जेठो भाई बाप बरोबरि | तुम्हरे गये बात बनि जाय॥
सुनिकै बातें ये मलखे की | आल्हा हाथी दीन बढ़ाय १८५
ठाढ़े पृथीराज जहाँ | तहँपर गये बनाफरराय॥
उतरिकै हाथी के हौदा ते | मनमें सुमिरि शारदा माय १८६
गये सामने जब पिरथी के | दधि औ पान दीन चपकाय॥
लखैं तमाशा तहँ नारी नर | भा समध्वार द्वार पर याय १८७
पिरथी बोले तहँ आल्हा सों | मानो कही बनाफरराय॥
अब तुम जावो निज तम्बू को | भौरी समय गयोन गचयाय १८८
निकै बातें ये पिरथी की | लश्कर कूच दीन करवाय॥