आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 229, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ें३६ आल्हखण्ड । २२४
करो तमाशा दिल्लीवाले अँगुरी दाँते लीन चपाय १५३
मलखे ऊदन दोऊ ठाकुर सम्मुख गही सूँढ़ को आय ॥
दाबिकै मस्तक तिन हाथिनका दूनों दीन्हों भूमि लुटाय १५४
दाँत तूरिकै तिन हाथिन का दोऊ चढ़े घोड़ पर आय ॥
ताहर बोले फिरि दोउन ते गानो कही बनाफरराय १५५
कलश गिरावो अब खम्भन ते तौ हम कही शूर फिरि भाय ॥
इतना सुनिकै जगनिक ठाकुर कलशन पासपहुँचा जाय १५६
ताहर बोला कमलापति सों मारो याहि दौरि सरदार ॥
इतना सुनिकै कमलापति फिरि दौरे लिहे नाँगितलवार १५७
क्रोगति बरखै जगनायक कै भैनो जौन चँदेले क्यार ॥
आवत दीख्यो कमलापति को गरुई हाँक दीन ललकार १५८
लौटिज ठाकुर म्वरे मुर्चाते नहिं शिर काटि देउँ भुइँ डारि ॥
सुनिकै बातें जगनायक की कमलापतिउ बढ़ायोरारि १५६
हथी बढ़ायो फिरि आगे को जगनिक पास पहुंच्यो जाय ॥
ऐँड़ लगायो हरनागर को हौदा उपर बिराजा आय १६०
भाला मार्यो कमलापति को सोतो लीन ढाल पर वार ॥
रिसहा बैकै जगनायक फिरि तुरतै खैंचिलीन तलवार १६१
ऐंचि महाउत की मारत भा तुरतै भूमि दीन शिरडार ॥
आवा मस्तक ते भूमा फिरि गरुई हाँक दीन ललकार १६२
सँभरिकै बैठै अब हौदापर ठाकुर हाथी के असवार ॥
की भगि जावै म्वरे मुर्चा ते नहिंअबजानचहतयमद्वार १६३
बातें सुनिकै जगनायक की कमलापतिउ दीन ललकार ॥
काह गवाँरे तू बोलत है ठाकुर घोड़े के असवार १६४
तू अस छत्री हम संगर में केतन्यो डारे खेलि शिकार ॥