आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमलखानका बिवाह । १८६ ३३
मारे मारे तलवारिन के तस गजराजा दीन बिछाय ॥
फिरि फिरि मारै औ ललकारै अद्भुतसमर कहा ना जाय ३३
सुनवाँ बोली फिरि इन्दल ते बेटा कहा मानि ले मोर ॥
पूंछ काटिले यह घोड़ाकी तौ नहिंरहै फेरि अस जोर ३४
इतना सुनिकै इन्दल तुरतै घोड़ा पास पहुंचे जाय ॥
पूंछ काटकै वहि घोड़ा की औ धरती माँ दीन गिराय ३५
सेमाभगतिनि घोड़ अगिनियाँ दोऊ बिना जोर भे भाय ॥
राजा सोच्यो अपने मनमाँ हमरो काल पहुँचा आय ३६
छोड़ि आसरा जिंदगानी का अपनो मया मोह बिसराय ॥
प्राण गदोरी पर धरि लीन्ह्यों आल्हा पास पहुँचा जाय ३७
औ ललकारा फिरि आल्हाको ठाकुर खबरदार है जाय ॥
धोखे भूले ना माड़ो के जहँ लै लिये बापका दायँ ३८
मैं गजराजा भुन्नागढ़ को सम्मुख लड़ो आजु सरदार ॥
ऐंड़ा मसके फिरि घोड़ा के आल्हा उपर हनी तलवार ३९
टूटि सिरोही गै राजाकै कबुजा रहा इकेलो हाथ ॥
साँकरि लै कै फिरि हाथी को आल्हा दीन सुमिरिरघुनाथ ४०
साँकरि फेरी पचशब्दा ने औ घोड़ाते दीन गिराय ॥
बाँधिकै मुशकें फिरि राजाकी आल्हा कूचदीन करवाय ४१
ऊदन बोले गजराजा सों म्वहिं मलखे को देउ बताय ॥
राजा बोलो तब ऊदन सों मानो कही बनाफरराय ४२
संग हमारे अब तुम चलिये औ मलखे को लवैं लिवाय ॥
इतना सुनिकै दूनों चलिभे खंदक पास पहुँचे जाय ४३
बज्रशिला को फिरि टारत भे रस्सा तुरत दीन लटकाय ॥
बाहर निकरे मलखे ठाकुर रोवा बहुत लहुरवा भाय ४४