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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 193

३२ आल्हखण्ड । १८८
दूध लरिकई मा पाये ना तेरे मेरे चढ़े ना घाव ॥
इतना सुनिकै गजराजा ने जल्दी हना दूसरा दाँव २१
वार बचाई बघऊदन ने राजा बहुत गयो शर्माय ॥
उसरिन उसरिन दुउ मारत भे शोभा कही बूत ना जाय २२
चिल्हिया बनिकै सेमाभगतिनि सुनवाँ पास पहुँची जाय ॥
दोनों चिल्हिया संगम ह्वैकै पंजन परन लड़ें नभधाय २३
इन्दल दीख्यो घोड़ा पर सों ऊपर आसमान की ओर ॥
दोनों चिल्हिया आसमान में भारी करें युद्ध अतिघोर २४
लड़िकै सटिकै संगम ह्वैकै दोऊ गिरीं धरणि में आय ॥
सुनवाँ बोली तब इन्दल ते मारो पूत याहि असिघाय २५
इन्दल बोले तब सुनवाँ ते माता सत्य कहौं समझाय ॥
हाथ मिहिरियापर डारें जो तौ रजपूती धर्म नशाय २६
सुनवाँ बोली फिरि इन्दल ते बेटा बार बार बलिजायँ ॥
जूरा काटो इह भगतिनि को तौ सबकाम सिद्धि ह्वैजायँ २७
सुनिकै बातें ये माताकी जूरा काटि लीन त्यहिकाल ॥
जादू झूठी भई सेमाकी सेमा परी बिपति के जाल २८
ज्यों त्यों करिकै झुन्नागढ़ को सेमाचली गई पछताय ॥
मनै सराहै भल सुनवाँ को आपनलिह्योबदलह्वॉआय २९
हवा चलाई जब पहिले मैं सुनवाँ बन्दकीन तब आय ॥
अपने हाथे मैं विष बोयों बनिकैचील्हलड़ियूँजोजाय ३०
ह्वाँ गजराजा हल्ला करिकै अति खलभला दीन मचाय।
लड़ै इकला सो घोड़ा पर कद्धादीन भूमि बिथराय ३१
पल्ला दै कै सय्यद ठाढ़े अल्हाऔबिसमिल्लागयेहिराय ॥
जैसे होरी बल्ला छूटै गल्ला यथा उसावा जाय ३२