आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमलखानका बिवाह । १८७ २१
ढाढ़ी करखा बोलन लागे बिप्रन कीन वेद उघार ॥
रणकी मौहरि बाजन लागी रणका होन लाग व्यवहार ९
खर खर खर खर कै रथ दौरे रब्बा चले पवन की चाल ॥
मारु मारु करि मौहरि बाजी बाजी हाव हाव करनाल १०
आगे हलका है हाथिन का पाछे चले जायँ असवार ॥
पैदल क्षत्री त्यहि पाछे सों हाथम लिये नाँगि तलवार ११
सुनि सुनि चोबें तहँ डङ्का की बोला तुरत बनाफरराय ॥
चढ़िकै आवत गजराजा है मानो कही शूर समुदाय १२
सुनिकै बातें बघऊदन की सँभले सबै शूर सरदार ॥
घड़ी न बीती ना दिन गुजरा फौजैं सबै भई तय्यार १३
दोऊ ओरते तोपैं छूटीं मानो प्रलय मेघ घहरान ॥
मारत मारत फिरि तोपन के संगम भये समर मैदान १४
ऊदन राजा सम्मुख हैगे राजा गरू दीन ललकार ॥
मुशकें छोड़ो दुउ पुत्रनकी ऊदन मानो कही हमार १५
लड़िकै बेटी तुम पैहौ ना मरिकै आन धरो अवतार ॥
सुनिकै बातें ये राजा की बोला उदयसिंह सरदार १६
घाटि बिसेने तुम कीन्ही है मलखे खन्दक दिये डराय ॥
बेटी ब्याहो औ फिरि जावो नाहीं गई प्राणपर आय १७
काम बिटेवन तें परिगा है कबहुँ न परा मर्द ते काम ॥
सम्मुख लड़िकै उदयसिंह ते अबहीं जानचहत यमधाम १८
इतना सुनिकै गजराजा ने आपनि ऐंचि लीन तलवार ॥
हनिकै मारा बघऊदन को ऊदन लीन ढालपर वार १६
फिरि ललकारा गजराजा को ठाकुर खबरदार हैंजाय ॥
पहिली कीन्हे दूसरि कैलै क्षत्री तोरि आहि रहिजाय २०