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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 17

१२    , आल्हखण्ड ।
चढ़ी जवानी पृथीराजकी कुश्ती लड़ै अखाड़े जायँ ॥
खनखनठनठन भनभनमनमन कैसो शब्द कानमें जाय ११२
बाण चलावैं जहाँ तानिकै ताको तुरतै देयँ नशाय ॥
ऐसे राजा पृथीराज हैं ओमहराज कनौजीराय ११३
सुनिकै बातें त्यहि बाम्हन की फिरि ना बोल्यो चँदेलाराय ॥
सभा विसर्जन करि जल्दी सों महलमें तुरतपहूंच्यो जाय ११४
कियो बियारी फिरि मंदिर में सोयो रामचन्द्रको ध्याय ॥
खेत छूटिगा दिननायक सों झंडागड़ानिशाकोआय ११५
तारागण सब चमकन लागे पक्षिन चुप्पसाधि तब लीन ॥
चलेआलसीखटिया तकितकि नाहकजन्म विधातै दीन ११६
आगे लड़ि हैं पृथुइराज अब करि हैं घोर शोर घमसान ॥
बैठो यारो अब थकिआयन मानो सत्यबचनपरमान ११७
इति श्रीलखनऊनवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायण
जीकीआज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गतपैंड़रीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भव
बुधकृपाशङ्करसूनु पण्डितललिताप्रसादकृत संयोगिनि
स्वयंवरोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥
सवैया ॥
भो शरणागतपाल कृपाल उदार अपार सबै गुण तेरे ।
यांचि भयौ शरणागत में न लह्यौ अजहूं तुमको कहुँ हेरे ॥
गावत संत महंत सबै कि हृदय बिच रामरहें सबै केरे ।
सो नहिं टेरे सुनैं ललिते फलिते न भयेहैं मनोरथमेरे १
सुमिरन ॥
बलेश्वरी पँड़री की गड़ये जिनकाविदितजगतपरताप ॥
मन औ बाणी सों जो ध्यावै ताके छूटिजायँ सब ताप १