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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 16

कहि ये बातें परशुराम सों फिरि बहुपुत्र सिखावनदीन ॥
सुनिकै बातें निज माताकी भीषमकहाबचनछलहीन १००
विजयपत्र जो म्वाहिं लिखिदेवैं तौ हम लौटि धामको जायँ ॥
नाहिं तो टरिहौं ना संगर ते बहुतनधजीधजीउड़िजाय१०१
सुनिकै बातें ये भीषम की औ हठ दीख टरै को नाहिं ॥
तब तो गंगा परशुराम सों बोलींहाथजोरित्यहिठाहिं १०२
लरिका अरुझो विजयपत्र को ओ जमदग्नितनय महराज ॥
विजयपत्र अब याको दीजै कीजैआपशिष्यकोकाज १०३
सुनिकै बिनती बहु गंगाकी तबतिनविजयपत्रलिखिदीन॥
विजयपत्र लै तहँ भीषमने औ पैलगी गुरुको कीन १०४
माथ नायकै फिरि गंगा को भीषम दीन्ह्यो शंख बजाय ॥
परशुराम निज आश्रम गमने भीषम घरै पहुंचे आय १०५
चित्र बिचित्रबीर्य रहें राजा भीषमकेर छोट दोउभाय ॥
तेऊ मरिगे विना पूत के तिनघरब्यास पहुंचे आय १०६
आँधर पांडु बिदुर तिनलरिका जिनकारहा जगतयशछाय ॥
अँधरे केरे दुर्योधन भे पांडुकेभये युधिष्ठिरराय १०७
दोऊ मिलिकै संगर ठान्यो तहँ सब क्षत्री गये बिलाय ॥
भयो परीक्षित फिरि दिल्लीपति ज्यहिभागवतसुन्योहर्षाय१०८
कलियुगआयो त्यही राज में ओ महराज कनौजीराय ॥
को गतिबरणैत्यहि कलियुगकै हमरे बूत कही ना जाय १०६
ऐसी दिल्ली की रजधानी जामें बसै पिथौराराय ॥
रूपउजागर सब गुण आगर शोभाकही तासु ना जाय ११०
नित प्रति पूजै शिवशंकेर का नाहर दिल्ली का सरदार ॥
गदका बाना पटा बनेठी इनमाँबहुतभांतिहुशियार १११