आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० आल्हखण्ड।
चढ़िकै डोलामें संयोगिनि सोऊ चली महल को जाय ॥
उठि महराजा फिरिमहफिलते औ दरबार पहुंचे आय ८८
मंत्री बैठत भो बाँयेंपर दहिने बैठि विप्र सब जाय ॥
त्यही समइया त्यहि औसर में राजा बोल्यो भुजा उठाय ८६
कौन पिथौरा को जानत है सन्मुख ठाढ़ होय सो आय ॥
सुनिकै बातें महराजाकी बूढ़ो विप्र उठा हर्षाय ६०
हमसों परचय पृथीराजसों ओ महराज कनौजीराय ॥
पाँच बरस हम दिल्ली रहिकै पूजाकीन तासु घर जाय ६१ ।
भोजन पाये त्यहि महलनमें बैठ्यन संग तासु महराज '
पूँछन चाहो का महराजा सो तुम कहौ आपनो काज ६२
सुनिकै बातें त्यहि ब्राह्मण की बोला तुरत कनौजीराय ॥
कस रजधानी है दिल्ली की कैसो वीर पिथौराराय ६३
सुनिकै बातें ये जयचंद की बोला विप्र बहुत सुख पाय ॥
नाम हस्तिनापुर दिल्लीका जानो आपु कनौजीराय ६४
आगे राजा शन्तनु ह्वैगे गंगा भई जासु की नारि ॥
तिनसुत भीषम फिरि पैदा भे कीन्ह्यो परशुराम सों रारि ६५
दिन सत्ताइस का संगरभा दूनों तरफ चले तहँ तीर ॥
मूर्च्छित ह्वैगे परशुराम जब गंगा आय छिडिक्यो नीर ६६
सनमुख ह्वैगे फिरि दोऊमिलि युद्धको होनलाग सामान ॥
तब समुझायो बहु गंगाने अब नहिं करो युद्ध को ठान ६७
तुम्हरो चेला यहु भीषम है ओ जमदग्नितनय बलवान॥
नाम तुम्हारो जग में ह्वैहै मानो सत्यबचन भगवान् ६८
चेला जिनको अस बलवन्ता है भगवन्ता के अनुमान ॥
धन्य बखानों तिन गुरु केरी रहिहै सदा जगतमें मान ६६