आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८८ आल्हखण्ड । १३४
पगड़ी गिरि गईँ त्यहि लोहू में फूले कमल सरिस दर्शायँ ४८
परीं बंदूकें कहुँ लोहू में काली नागिनिसी मन्नायँ ॥
पांच कोसलों चली सिरोही लोथिन उपरलोथि दिखरायँ ४६
बड़ी लड़ाई मै नैनागढ़ मारा मारा परै सुनाय ॥
कोऊ हारा नहिं काहू सों दोउरण परा बरोबरि आय ५०
जोगा ठाकुर नैनागढ़ का सय्यद बनरस का सरदार ॥
भोगा देवाके मुर्चा माँ दोउ दिशिहोय बरोबरि मार ५१
'मन्नागूजर पूरन राजा दोऊ करें खूब तलवार ॥
बड़े लड़ैया रणमाँ राहिगे कायर छांड़ि भागि हथियार ५२
अमरढोल कहुँ रणमाँ बाजै गिरि उठि लड़ैं लड़ैताज्वान ॥
देखि तमाशा ऊदन बोले दादा सुनो बीर मलखान ५३
मरिमरि जीवैं नैनागढ़ के मैना दीख कबों असभाय ॥
कावा दै कै ऊदन चलिभे नैनागढ़ै पहुंचे आय ५४
संध्या द्वैगै ह्वाँ लश्कर में तब फिरि मारु बंद द्वैजाय ॥
ऊदन पहुंचे ह्वाँ मालिन घर तुरतै मोहर दीन थँभाय ५५
खबरि सुनावो म्वारि भौजीका आयो मिलन उदयसिंहराय ॥
सुनिकै वातैं मालिनि चलिभै सुनवैं खबरि सुनाई जाय ५६
सुनवाँ चलिभै तब महलन ते आई जहाँ लहुरवा भाय ॥
पाग बैंजनी शिरपर बाँधे ऊदन कह्यो बचन मुसुकाय ५७
याही कारण चिठिया पठई जल्दी अवो लहुरवा भाय ॥
जियत मोहोबे कोउ जाई ना डरिहौ बंश नाश करवाय ५८
मरे सिपाही क्यों जीवत हैं भौजी हाल देउ बतलाय ॥
सुनिकै वातें सुनवाँ बोली तुम सुनिलेउ लहुरवा भाय ५६
बरा बर्षलों मेरे वापने कीन्ह्यो कठिन तपस्या जाय ॥