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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 138

[Header] आल्हाका बिवाह । १३३ १७

देवी शारदा महहरवाली मानों गई भुजापर आय ३६
बाहू फरके बघऊदन के फौजन घुसा बनाफरराय ॥
जैसे भेड़िन भेड़हा पैठै जैसे अहिर बिडारै गाय ३७
तैसे क्षत्री ऊदन देखैं भागैं तुरतै पीठि दिखाय ॥
बड़ी लड़ाई मलखे कीन्हों अद्भुतसमर कहा ना जाय ३८
घोड़ मनोहर की पीठीपर देबा गरु करै ललकार ॥
हनि हनि मारै रजपूतन को बहुतक जूझिगये सरदार ३९
अली अलामत औ दरियाखाँ बेटा जानबेग सुल्तान ॥
ये सब लड़का सय्यदवाले तहँपर करैं घोर घमसान ४०
मन्ना गूजर मोहबेवाला दोऊ हाथ करै तलवार ॥
जोगा भोगा पूरन राजा येऊ करैं तहां पर मार ४१
जूझे सिपाही नैनागढ़ के लगभग एक लाखके ज्वान ॥
पांच सहस मोहबे के जूझे करिकै समर भूमि मैदान ४२
जोगा बोला तब भोगा ते मानो कही हमारी बात ॥
खबरि सुनावो महाराजाको जैसी देखि परै कुशलात ४३
सुनिकै बातें भोगा चलिभा नैनागढ़ै पहूंचा जाय ॥
हाथ जोरिकै महाराजा के भोगा यथातथ्य गा गाय ४४
सुनिकै बातें महाराजा ने लायो अमरढोल को जाय ॥
सो दै दीन्ह्यो कर भोगा के भोगाचलिभाशीशनवाय ४५
आयकै पहुंच्यो समर भूमि में भोगा दीन्ह्यो ढोल बजाय ॥
मुर्दा उठिकै जिन्दा हैंगे घैहा उठे तुरत हरषाय ४६
उठे सिपाही नैनागढ़ के मारैं खैंचि खैंचि तलवार ॥
मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार ४७
ढारे मुर्दा हैं लोहुन में मानों कच्छ मच्छ उतरायँ ॥