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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 135

१४ आल्हखण्ड । १३०
अथ कथाप्रसंग ॥
उदय दिवाकर भे पूरबमाँ किरणन कीन जगत उजियार ॥
डंका बाज्यो नैनागढ़माँ सबियाँ फौज भई तय्यार १
बसैं बघेले औ चन्देले पाँवर सूरबंश सरदार ॥
माड़वाड़ के क्षत्री साजे औ परिहार गुटैयाचार २
हाड़ा वाले बूंदी वाले औ राठौर लीन सजाय ॥
तुरत निकुम्भन को सजवायो औ गौरन को लीन बुलाय ३
सजि गुहलौता औ कछवाये बहुतक चन्द्रबंश के ज्वान ॥
तोमर ठाकुर तुमरवार के सजिगे मैनपुरी चवहान ४
सजे भदावर वाले क्षत्री सजिगे गहिलवार सरदार ॥
बैस डौंडियाखेरे वाले जिनके बांट परी तलवार ५
हबशी साजे औ दुर्रानी जे मनइन के करें अहार ॥
कुरी छतीसों सब सजवाई ठाकुर सबै भये तय्यार ६
पूरन राजा पटनावाला सोऊ लीन ढाल तलवार ॥
जोगा भोगा दोनों ठाकुर अपने घोड़न भे असवार ७
रणकी मौहरि बाजन लागी रणकौ होनलाग व्यवहार ॥
दाढ़ी करखा बोलन लागे विप्रन कीन वेद उच्चार ८
मारु मारुकै मौहरि बाजी बाजी हाव हाव करनाल
को गति वरणै तहँ क्षत्रिनकै एक ते एक दई के लाल ६
हतु हुंकारनि तोपैं सजि गईँ जिनसों होय घोर घमसान ॥
मारू डंका बाजन लागे घूमन लागे लाल निशान १०
खर खर खर खरकै रथ दौरे ख्बा चले पवन की चाल ॥
खट पट खट पट तेगा बोलैं मर मर होयँ गैंड़की ढाल ११
धक धक धक धक करै महावत हाथी धकापेल चलिजायें ॥