आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 136, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ें[Header] आल्हाका विवाह । १३१ १५
कोउ कोउ घोड़ा मोर चालपर कोउ कोउ सरपट रहे भगाय १२
कोउ कोउ घोड़ा हंस चालपर कोउ कोउ चले कदमपर जायँ ॥
कोउ कोउ घोड़ा ऐसे जावैं जिनके टाप न परै सुनाय १३
कोउ कोउ घोड़ा कावा देवैं कोउ कोउ गर्जि रहे असवार ॥
कउँधालपकनिबिजुलीचमकनि चमचम चमाचम्म तलवार १४
घन घन घन घन घंटा बाजैं घूमत चलैं मत्त गजराज ॥
बल बल बल बल करैं साँड़िया भागत चलैं समर के काज १५
हिनहिन हिन हिन घोड़ा हींसैं खीसैं कायर देखि परान ॥
छाय अँधरिया गै पृथ्विी में गर्दा छाय गई असमान १६
देवता सकुचे आसमान में जंगल जीव गये थर्राय ॥
घरी चार के फिरि अर्सा में सेना अटी समर में आय १७
धूली दीख्यो आसमान में मलखे बोल्यो बचन सुनाय ॥
सजो बेन्दुला के चढ़वैया फौजै गई ऊपर अब आय १८
सुनिकै बातें मलखाने की ऊदन गरु दीन ललकार ॥
सजो सिपाही मोहबे वाले सबियाँ फौज होय तैयार १६
झीलम बख्तर पहिरिसिपाहिन हाथ म लीन ढाल तलवार ॥
सिरगा घोड़े की पीठिमाँ सय्यद तुरत भये असवार २०
चढ़ो कबूतरी में मलखाने अपनी लिये ढाल तलवार ॥
घोड़ मनोहर की पीठी माँ देवा चढ़त न लागी बार २१
बड़ी बड़ी तोपैं अष्टधातु की सो चरखिन में दीन चढ़ाय ॥
लै लै थैली बारूदन की सो तोपन में दई चलाय २२
बत्ती दइ दइ फिरि तोपन में रंजक तुरत दीन धरवाय ॥
बम्बके गोला छूटन लागे परलय जनो गई नगच्याय २३
गोली ओला सम वर्षत भई भनभन भन्नभन्न भन्नाय ॥