आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
DevanagariHindipublished618 पृष्ठ
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अथ आल्हखण्ड ॥
नैनागढ़की लड़ाई अथवा आल्हाका विवाह ॥
सवैया ॥
दीनसहायक नाम तुम्हार सुना बहु ग्रन्थन में महराजा ।
है शबरी गजगीध अजामिल ते अजहूं जिहिकोयशछाजा॥
जो करणी सुमिरों इनकी तबहीं मन धैर्य्य लहै रघुराजा ।
दीन पुकारकरै ललिते प्रभु बेगि द्रवो हे गरीब नेवाजा १॥
सुमिरन ॥
गया न कीन्ही जिन कलियुगमाँ काशिम घोड़ दान नहिंदीन ॥
जन्मत बैरी जिन मारा ना नाहक जन्म जगत में लीन १
पूजा कीन्ही नहिं शम्भू की अक्षत चन्दन फूल चढ़ाय ॥
फिरि गलभँदरी जिनबाजी ना मुख ना बम्ब बम्ब गा छाय २
भसमरमायो नहिं देही माँ कवहूंन लीन सुमिरनी हाथ ॥
सोचन लायक ते आय हैं जिन नहिं कबौं नवायोमाथ ३
को अस देवता रहै शम्भूसम जिनको पूज्यो रामउदार ॥
वेद उपनिषदके ज्ञाता रहें जिनबल भयो रावणाद्धार ४